Sunday, 12 July 2020

Unmadini Yashoda - 87

🔆          [जय गौर हरि]            🔆

▪        [उन्मादिनी यशोदा-87] ▪

🔅मईया किसी हंस के आँगन मेँ उतरते ही उसे कुछ खिलाने दौड़ती है और अपने अंक मेँ पुचकार कर बैठाती है--'कन्हैया प्रसन्न है?'

▪'मेरे कन्हैया से ऐसा कुछ मत कहना,जिससे वह उदास हो जाय।' मईया केवल हंसो से ही नहीँ,सारसो,कपोतो,नन्हीँ बुलबुलो से भी अपने कन्हैया की बातेँ करती रहती है।'

🔅'मैँ तुम्हारी बात नहीँ समझ पाती। गाँव की ग्वालिन ही तो हुँ;किन्तु कन्हैया तो शैशव से तुम सबकी बात समझता था।' 

▪मईया विभोर होकर कहती है--'वही मुझे बतलाता था कि कपोत क्या कहता है अथवा गिलहरी क्या माँगती है।

🔅मईया के आँगन मेँ तो पशु-पक्षी सभी मिल ही रहे हैँ। पक्षी स्वतन्त्र है पशुओँ के शरीर पर बैठने या उनके पैरो के घूमने को। यह तो किसी भी बालक गोपी या गोप के कन्धे पर सिर पर चाहे जब चाहे बैठ जाने वाले हैँ।

▪मईया पशुओँ पर अत्यन्त सदय है तो पक्षियो  पर इसका स्नेह उमड़ पड़ता है। पशु कन्हैया के वियोग मेँ दुर्बल,दीन हो रहे हैँ;किन्तु पक्षियो की दुर्बलता इनके पंख छिपाये रहते है। अवश्य इनके पंख मलिन हो रहे हैँ-किन्तु मईया का ध्यान इधर कम जाता है। यह समझ नहीँ पाती कि पक्षी उदास क्यो दीखते हैँ।' 

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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Wednesday, 8 July 2020

Immagini Yashoda 82

🔆          [जय गौर हरि]            🔆

▪       [उन्मादिनी यशोदा-82]  ▪

🔅'यह तो शारदीय वर्षा है।' गोपियाँ मईया को आश7्वासन देती रहती हैँ। लेकिन मईया इतनी भी स्वस्थ कितने दिन रहती है? कोई ऋषि-मुनि आये तो उनका सत्कार इसका व्यसन है। स्वस्थ हो या अस्वस्थ अतिथि के सत्कार मेँ जाती;किन्तु कोई द्वारिका के समाचार सुनाने लगेगा, कन्हैया की चर्चा करेगा तो हक्की-बक्की हो उठती।

▪'कन्हैया,अच्छा! मन मेँ कहती--पता नहीँ किसके कौन से कन्हैया की बात है?' 

🔅मेरे कन्हैया को आशीर्वाद दे जाइये! वह सो रहा है।' अपनी शय्या पर से उत्तरीय से ढका तकिया उठाने जाती।

▪'यह तो तकिया है।' ऐसे अवसर पर सेविकाओँ को कहना ही पड़ता है।

🔅'अच्छा! मईया अपने उन्माद मेँ फिर भी हँसती--'मैँ ही पगली हूँ। वह बड़ा हो गया है। गायें चराने गया है। किसी को भेजकर उसे बुला ले। तब तक मैँ ऋषि महाराज को रोकती हूँ। यह उसे आशीर्वाद देँगे।

▪सेविका को कहना पड़ता है--मईया यह ऋषि महाराज आपके कन्हैया का ही तो समाचार देने आये हैँ। सेविका जानती है वह तो बड़े भाई के साथ मथुरा से भी द्वारिका चला गया है। सेविका जानती है कि अभी सावधान नहीँ करेगी तो कुछ स्वस्थ होने पर उसकी यह स्वामिनी बहुत अधिक दुखी हो जाएगी।

🔅मईया सावधान होकर अत्यधिक दुखी हो जाती है और कहती है--'वह प्रसन्न है? क्या करता है? कैसे रहता है? दुबला हो गया होगा।' मेरा लाल सुखी रहे।

▪मईया पता नहीँ क्या-क्या पूछना चाहती है; किन्तु कितनी भी उन्मादिनी हो,अपनी,अपने दुख की, ब्रज की चर्चा नहीँ करेगी। सदा इसे भय रहता है--'कोई यहाँ की चर्चा उससे जाकर न करे। वह सुनकर दुखी होगा। 

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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