🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-115 ] ▪
🔅ब्रज मेँ सहस्त्रश: बालक हैं। नन्दब्रज की ही नहीँ,दूसरे गाँवों की भी बालिकाएँ हैँ। न बालकों को न बालिकाओं को समूह बनाकर आना है। वियोग से व्याकुल व्यक्ति एकान्त चाहता है या समूह बनाता है। अतिथि-अभ्यागत के सत्कार मेँ व्यस्त न हो तो रात्रि मेँ भी अनेक बार कोई बालक या बालिका इसके अंक मेँ सिसकती सोती रहे, यह साधारण बात है। दिन मेँ तो यह कई-कई बच्चों को एक साथ सम्हालती ही रहती है।
▪यह बालक बालिकाएँ अन्तत: क्योँ रोते हैँ? क्योँ व्याकुल होते हैँ,यह भी क्या कहने-पूछने की बात है। इनके अतिरिक्त भी कम निमित्त कहाँ हैँ जो मईया को अपने कन्हैया का स्मरण दिलाते हैँ। कन्हैया नहीँ है,यह स्मरण दिलाते हैँ। आँधी आयेगी,पानी आयेगा,शीत या गर्मी पड़ेगी इसे कोई रोका जा सकता है?
🔅गायें , बछड़े-बछड़ियाँ, कुत्ते,बिल्लियाँ,बन्दर,मयूर,काक सब है। पता नहीँ ओर कितने पशु-पक्षी हैँ। इन सबको ब्रजराज के आँगन मेँ ही मंडराते रहना है। बार बार भाग आते हैँ। इन सबको ब्रज से बाहर भगा देने की बात कोई सोच सकता है? मईया को तो यह सब इसके कन्हैया का स्मरण कराते हैँ।
▪गोपराज का सदन है। इसमेँ दूध, दही माखन तो भरा ही रहेगा। रस्सियाँ इधर-उधर पड़ी ही रहेँगी। ऊखल को उठाकर कहीँ फेँका जा नहीँ सकता। घर मेँ ही अभी धरी है कन्हैया की वंशी, अनेक पटुके मोहन के मईया ने सम्हाल कर रखे हैँ। मयूरपिच्छ तो ब्रज मेँ वृक्षों के नीचे भी मिल जाते हैँ। यह तो ब्रजेश्वर का सदन है।
🔅यह सब न भी हो तो ऐसी कोई वस्तु हैँ ब्रज मेँ जिसको देखकर कन्हैया का स्मरण न हो? यहाँ की एक एक वस्तु मेँ,तृण पत्ते मेँ तो उस नील सुन्दर का स्पर्श बसा है। एक-एक प्राणी उसका अपना है। पशु पक्षी ही नहीँ,कीट भृंग, तितलियाँ तक उसका स्मरण कराती हैँ। मईया की दृष्टि जिधर उठेगी, उसे अपने लाल का स्मरण कराने वाली ही वस्तुएँ तो मिलती हैँ।
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪
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