🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-102] ▪
🔅वियोग भी योग की भाँति समाधि देता है। वि+योग, योग से विशेष होने से ही तो इसे वियोग कहा गया है। यम-वियोग, आसन, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान के क्रम से साधन करने पर योग मेँ समाधि की उपलब्धि होती है; किन्तु वियोग की तीव्रता प्रत्येक स्थिति मेँ समाधि दे देती है। आप भले इसे भाव-समाधि कह लेँ।
▪जाग रहे हैँ, निद्रा नहीँ है,मनोलय भी नहीँ है, परन्तु शरीर का ध्यान नहीँ है। कोई इन्द्रिय से कोई सूचना मन ग्रहण नहीँ कर रहा है और अपनी ऊहापोह मेँ भी नहीँ है। इसी अवस्था का नाम समाधि है या और कुछ ?
🔅मईया न तो समाधि जानती और न भावसमाधि। वह तो बैठी-बैठी या खड़े भी अद्भुत शून्यता को प्राप्त हो जाती है। खड़ी हो तो सूखे काठ के समान गिर पड़ती है।
▪मईया कहती है--'मैँ भाग्यहीना हूँ। त्रिभूवन मेँ अलभ्य मणि मैँने पायी थी और उसे खो दिया!' मईया का श्रीमुख श्वेत पड़ जाता है जैसे शरीर मेँ एक बूंद भी रक्त न हो। बैठी हो या खड़ी, नेत्र पथराने लगते हैं। संज्ञा लुप्त हो जाती है।
🔅सेविकाएँ भागती हैँ श्री ब्रजराज को बुलाने। इतनी ही विपत्ति नहीँ है। चाहे जब मईया का सिंदूर-विनिन्दक अंग नीला पड़ने लगता है। सम्पूर्ण शरीर रक्तहीन, शुष्क, काला पड़ जाता है। जैसे अग्नि मेँ अधजला काष्ठ हो।
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪
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