Friday, 11 December 2015

unmadini yashoda 105

🔆           [जय गौर हरि]            🔆

▪       [उन्मादिनी यशोदा-105]  ▪

🔅वियोग और हास्य? वेदना मेँ हँसी? समझ मेँ आता है कुछ? समझ मेँ आये या न आये: किन्तु मईया हँसती है, अनेक बार हँसती है। विचित्र हँसी हँसती है , हँसने लगेगी तो देर तक हँसती ही रहेगी।

▪मईया का स्वभाव कभी खुलकर हँसने का नहीँ यह तो केवल मुस्कराती है; किन्तु यदि कभी हँस पड़े तो लगता है कि चाँदी की घंटियाँ बज उठी हैँ। मईया की दन्तपंक्ति की किरणों से उस समय इनके लाल के पतले अधर दुग्धोज्वल हो उठते हैँ। अनेक बार शैशव मेँ कन्हैया इन्हेँ इसलिए गुदगुदाता था कि इनकी मधुर हास्य-ध्वनि सुनने को मिले।

🔅गोपियाँ कहती हैँ--'कन्हैया को माता-पिता से रंग-रुप कुछ नहीँ मिला है; किन्तु हँसी इन्हेँ अपनी माता की मिली है। ब्रजेश्वरी जैसी ही मधुर हास्य-ध्वनि और वही दन्तकान्ति।'

▪मईया को अपने लाल की कोई बात स्मरण आती हो और यह तब हँसती हो, ऐसी बात नहीँ है । यह तो ऐसी बातें सोचकर हँसने लगती है कि इनका हास्य इनके रुदन से अधिक आशंकाप्रद हो गया है।

🔅मईया गोपी से पूछती है---'क्यो री! मैँ ऐसे ही मर जाऊँ तो भूतनी बनूँगी? सुना है कि जिसका मन यहीँ किसी मेँ लगा रहता है, वह मरकर भूत बनता है।' मेरा लाल मुझसे डरेगा तो नहीँ?'

▪गोपी कातर होकर कहती है-'आप यह सब क्या सोचने लगी हैँ?'

🔅मईया हँसने लगी है-मैँ अपने कन्हैया को डराऊँगी नहीँ।' मैँ उसका स्पर्श भी नहीँ करुँगी। भूतनी के स्पर्श से तो अनिष्ट होता है: किन्तु मैँ भूतनी बनूँगी।'

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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