Friday, 11 December 2015

unmadini yashoda 110

🔆          [जय गौर हरि]            🔆

▪        [उन्मादिनी यशोदा-110]  ▪

🔅मईया का वीणा-बिनिन्दक स्वर,इसका यह तन्मय होकर पुलकित गायन ! यही स्वर,यही गायन है कि इसके आरम्भ होते ही आकाश मेँ उड़ते पक्षी तक मईया के आँगन मेँ उतर आते थे। दूर कूदते , खेलते बन्दर सब छोड़कर दौड़ आते थे। मईया के आँगन मेँ गोपियोँ का ही नहीँ, पशु-पक्षियोँ तक का ठट्ट लग जाता था। सब नीरव, सब निस्पन्द, सब तन्मय जैसे सब मूर्तियाँ होँ। मईया जब अपने गायन से सचेत होती थी तो अपने आँगन की भीड़ देखकर मुस्करा उठती थी। गोपियोँ से पूछती कि वे क्योँ आयी हैँ। पशु-पक्षियोँ को, बन्दरोँ को कुछ आहार देने को उठाती--'तुम सबको भूख लगी है? तुम बोलकर क्योँ नहीँ माँगते।'

▪कोई भी गोपी कहती मईया हम सब और यह सब भी आपका गीत सुनने आये हैं।

🔅'चल! बन्दर और पक्षी गीत सुनते होँगे।' मईया को यह भी नहीँ लगता था कि गोपियाँ भी सचमुच उसका गायन सुनने आयीँ हैं। मईया दूसरे के लिए कभी कहाँ गाती है। यह तो कहती है--'मुझे कहाँ गाना आता है। मैँ तो यूँ ही गुनगुना रही थी।'

▪अब वही स्वर, वही कण्ठ, वही संगीत; किन्तु गोपियाँ अश्रु पोँछती हैँ। पक्षी उड़ना त्यागकर पंखोँ मेँ मुख दुबका लेते हैँ। बन्दर तक मुख लटलाकर बैठ जाते हैँ। लताएँ आँसू के समान पुष्प, पत्ते गिराने लगती हैँ। लेकिन मईया को कोई टोकने का साहस नहीँ कर पाता। इस दुखिया का यह दो क्षण का सुख''''।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

🔆▪🔆▪🔅▪🔆▪🔆

No comments:

Post a Comment