Friday, 11 December 2015

unmadini yashoda 104

🔆           [जय गौर हरि]            🔆

▪       [उन्मादिनी यशोदा-104]  ▪

🔅 गोपियाँ व्याकुल होकर इधर-उधर दौड़ती हैं। कन्हैया का पटुका,वंशी,मयूरपिच्छ जैसा कुछ लाकर मईया के सामने करती हैँ और कहती हैं --'ब्रजेश्वरी! यह क्या है? इसे पहचानती हो?'

▪मईया अपने लाल के वस्त्र,वंशी,आभरण नहीँ पहिचानेगी? वह झपट लेती है और दोनोँ हाथों से ह्रदय से दबा लेती है--'कन्हैया!'

🔅मईया फिर भी चेतना-शून्य हो जाती है। प्राय: ऐसे समय मेँ इसकी शून्यता दूसरों को कम आशंकित करती है। अश्रु प्रवाह नेत्र के कोनों से चलने लगता है। शरीर से स्वेदधारा भी चलती है और कम्प भी होता है। लेकिन रोम-रोम उत्थित हो जाता है।देह से जैसे प्रकाश की किरणें फूटने लगती हैं। अंगकान्ति बहुत बढ़ जाती है। कभी-कभी मुख की ज्योति इतनी बढ़ जाती है कि इसकी ओर देखा नहीँ जाता। वैसे तब भी संज्ञा शून्य ही रहती है।

▪सेविकाएँ, गोपियाँ भी चकित देखती रह जाती हैँ। इस अवस्था मेँ मईया को स्पर्श करना,हिलाना,पुतारना कुछ सम्भव नहीँ होता। गोपियों को लगता है कि मईया मेँ कोई देवी आविष्ट हो गयी है। वह हाथ जोड़ती हैं, भूमि पर मस्तक पर प्रणाम करती हैँ। इन सबको कौन समझाये कि मईया से बड़ी कोई देवी कहीँ है ही नहीँ। यह स्वयं महाशक्ति है।

🔅मईया की शून्यता कितनी देर रहेगी, कोई कह नहीँ सकता। कभी बहुत देर भी होती है।तब गोपियाँ इसके चारों और एकत्र हो जाती हैं ताली बजा-बजाकर गाने लगती हैं--

🔺'नीलमणि श्यामसुन्दर गोपाल गोविन्द!'

▪यह कीर्तन मईया को सचेत करता है। बहुत धीरे-धीरे संज्ञा  लौटती है। इधर-उधर देखेगी और शिथिल स्वर मेँ पूछती--'कन्हैया गोचारण करने गया? मुझे क्या हो गया था? तुम सबने जगाया क्योँ नहीँ? वह कलेऊ कर गया?

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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