Friday, 11 December 2015

unmadini yashoda 114

🔆            [जय गौर हरि]              🔆

▪        [उन्मादिनी यशोदा-114]     ▪

🔅वनमाला के विषम वियोग ने मईया को उन्मादिनी बना दिया है। मईया सोते-जागते, प्रभात-मध्याह्र, सायं तथा रात्रि मेँ भी अपने कन्हैया की धुन मेँ निमग्न रहा करती है।

▪बाबा से, गोपों से,गोपियों से,सबसे मईया अत्यन्त दीन अनुरोध चलता ही रहता है-'मेरा कन्हैया खो गया है। उसे ढ़ूँढ़कर ला दो। मैँ उसके बिना मणिहीना सर्पिणी हो रही हूँ। मुझे ही कोई उसके समीप पहुँचा दो।'

🔅मईया ने कभी जाना नहीं कि वह ब्रजेश्वरी हैँ। इसमेँ प्रभुत्व का स्वर कभी प्रकट नहीँ हुआ; किन्तु कन्हैया के वियोग ने तो इसे कंगालिनी बना दिया है। सेवकों तक से गिड़गिड़ाती रहती है।

▪मईया कितनी भी उन्मादिनी हो, यही आश्रय है ब्रज के सब बालकों, बालिकाओं की और अतिथियों, ऋषि-मुनियों ,ब्राह्म्णों की सेवा-सत्कार मेँ इससे किञ्चित भी त्रुटि नहीँ हो सकती।

🔅ऋषि मुनि आते ही रहते हैँ। अतिथि कोई इधर से निकलता,  उसे सीधे ब्रजराज की पौरि पूछते आना है। मईया को सबसे अपने कन्हैया के लिए आशीर्वाद चाहिए और आशीर्वाद तो उत्तम सत्कार करके ही पाया जा सकता है।

▪चातुर्मास मेँ अतिथि नहीँ आते; किन्तु तब ब्रज मेँ आकर चातुर्मास करने वाले महात्माओँ का समुदाय होता है। दूसरे दिनों मेँ ऐसा कोई ही अन्धड़-वर्षा का,दुर्दिन होता है, जब बाबा के यहाँ कोई अतिथि न आये। मईया को इस सत्कार मेँ सदा व्यस्त रहना है।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

🔆▪🔆▪🔅▪🔆▪🔆

No comments:

Post a Comment