Yashoda उन्मादिनी यशोदा
Sunday, 12 July 2020
Unmadini Yashoda - 87
Wednesday, 8 July 2020
Immagini Yashoda 82
Friday, 11 December 2015
unmadini yashoda 115
🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-115 ] ▪
🔅ब्रज मेँ सहस्त्रश: बालक हैं। नन्दब्रज की ही नहीँ,दूसरे गाँवों की भी बालिकाएँ हैँ। न बालकों को न बालिकाओं को समूह बनाकर आना है। वियोग से व्याकुल व्यक्ति एकान्त चाहता है या समूह बनाता है। अतिथि-अभ्यागत के सत्कार मेँ व्यस्त न हो तो रात्रि मेँ भी अनेक बार कोई बालक या बालिका इसके अंक मेँ सिसकती सोती रहे, यह साधारण बात है। दिन मेँ तो यह कई-कई बच्चों को एक साथ सम्हालती ही रहती है।
▪यह बालक बालिकाएँ अन्तत: क्योँ रोते हैँ? क्योँ व्याकुल होते हैँ,यह भी क्या कहने-पूछने की बात है। इनके अतिरिक्त भी कम निमित्त कहाँ हैँ जो मईया को अपने कन्हैया का स्मरण दिलाते हैँ। कन्हैया नहीँ है,यह स्मरण दिलाते हैँ। आँधी आयेगी,पानी आयेगा,शीत या गर्मी पड़ेगी इसे कोई रोका जा सकता है?
🔅गायें , बछड़े-बछड़ियाँ, कुत्ते,बिल्लियाँ,बन्दर,मयूर,काक सब है। पता नहीँ ओर कितने पशु-पक्षी हैँ। इन सबको ब्रजराज के आँगन मेँ ही मंडराते रहना है। बार बार भाग आते हैँ। इन सबको ब्रज से बाहर भगा देने की बात कोई सोच सकता है? मईया को तो यह सब इसके कन्हैया का स्मरण कराते हैँ।
▪गोपराज का सदन है। इसमेँ दूध, दही माखन तो भरा ही रहेगा। रस्सियाँ इधर-उधर पड़ी ही रहेँगी। ऊखल को उठाकर कहीँ फेँका जा नहीँ सकता। घर मेँ ही अभी धरी है कन्हैया की वंशी, अनेक पटुके मोहन के मईया ने सम्हाल कर रखे हैँ। मयूरपिच्छ तो ब्रज मेँ वृक्षों के नीचे भी मिल जाते हैँ। यह तो ब्रजेश्वर का सदन है।
🔅यह सब न भी हो तो ऐसी कोई वस्तु हैँ ब्रज मेँ जिसको देखकर कन्हैया का स्मरण न हो? यहाँ की एक एक वस्तु मेँ,तृण पत्ते मेँ तो उस नील सुन्दर का स्पर्श बसा है। एक-एक प्राणी उसका अपना है। पशु पक्षी ही नहीँ,कीट भृंग, तितलियाँ तक उसका स्मरण कराती हैँ। मईया की दृष्टि जिधर उठेगी, उसे अपने लाल का स्मरण कराने वाली ही वस्तुएँ तो मिलती हैँ।
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪
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unmadini yashoda 114
🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-114] ▪
🔅वनमाला के विषम वियोग ने मईया को उन्मादिनी बना दिया है। मईया सोते-जागते, प्रभात-मध्याह्र, सायं तथा रात्रि मेँ भी अपने कन्हैया की धुन मेँ निमग्न रहा करती है।
▪बाबा से, गोपों से,गोपियों से,सबसे मईया अत्यन्त दीन अनुरोध चलता ही रहता है-'मेरा कन्हैया खो गया है। उसे ढ़ूँढ़कर ला दो। मैँ उसके बिना मणिहीना सर्पिणी हो रही हूँ। मुझे ही कोई उसके समीप पहुँचा दो।'
🔅मईया ने कभी जाना नहीं कि वह ब्रजेश्वरी हैँ। इसमेँ प्रभुत्व का स्वर कभी प्रकट नहीँ हुआ; किन्तु कन्हैया के वियोग ने तो इसे कंगालिनी बना दिया है। सेवकों तक से गिड़गिड़ाती रहती है।
▪मईया कितनी भी उन्मादिनी हो, यही आश्रय है ब्रज के सब बालकों, बालिकाओं की और अतिथियों, ऋषि-मुनियों ,ब्राह्म्णों की सेवा-सत्कार मेँ इससे किञ्चित भी त्रुटि नहीँ हो सकती।
🔅ऋषि मुनि आते ही रहते हैँ। अतिथि कोई इधर से निकलता, उसे सीधे ब्रजराज की पौरि पूछते आना है। मईया को सबसे अपने कन्हैया के लिए आशीर्वाद चाहिए और आशीर्वाद तो उत्तम सत्कार करके ही पाया जा सकता है।
▪चातुर्मास मेँ अतिथि नहीँ आते; किन्तु तब ब्रज मेँ आकर चातुर्मास करने वाले महात्माओँ का समुदाय होता है। दूसरे दिनों मेँ ऐसा कोई ही अन्धड़-वर्षा का,दुर्दिन होता है, जब बाबा के यहाँ कोई अतिथि न आये। मईया को इस सत्कार मेँ सदा व्यस्त रहना है।
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪
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unmadini yashoda 112
🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-112] ▪
🔅 मईया की शय्या के वस्त्र सूँघने की किसी को आवश्यकता नहीँ है। यह गन्ध भी क्या त्रिभुवन मेँ छिपती है। यह तुलसी-मिश्रित नीलकमल-सी विचित्र दिव्य गन्ध-श्यामसुन्दर के श्रीअंग की इस गन्ध को भी क्या पहिचानना है? गोपियाँ, सेविकाएँ केवल चकित सी देखती रह जाती हैँ। किसी के समीप इसका कोई समाधान नहीँ है।
▪इससे भी अद्भुत चकित करने की बात-मईया पुकार रही है, पुचकार रही है--'कन्हैया! मेरे लाल! डर मत। भाग मत। मैँ तुझे मारुँगी नहीँ। तुझे नहीँ बांधुंगी। कुछ नहीँ कहुँगी तुझे। क्या हुआ जो दही फैल गया। तू भूखा है। कलेऊ कर ले लाल।'
🔅कक्ष मेँ दही फैला पड़ा है और दही मेँ भीगे नन्हें चरणों के चिन्ह द्वार तक चले गये हैँ। ये बज्र, ध्वज, अंकुश, पद्य के चिन्ह और किसी बालक के ब्रज मेँ हैँ? संसार मेँ किसी और के चरणों मेँ सुने गये हैँ? इन चिन्हों को मईया ने कल्पना से तो नहीँ बनाया होगा। मईया इन चिन्हों के सम्बन्ध मेँ जो कहती है, वह कोई समझ मेँ आने की बात है।
▪'मैँ दधि-मन्थन करते करते तनिक दूध देखने चली गयी थी। मुझे क्या पता था कि कन्हैया इतने मेँ जाग जायगा। उसे तो मैँ सोता छोड़कर उठी थी। वह उठकर आया होगा। मईया को कुछ अद्भुत नहीँ लगता-'इतने बड़े मटके मेँ उझककर माखन देखने लगा होगा। चपल तो है ही, हाथ डालता होगा। मटका उलट गया। अब डरकर भाग गया है।'
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪
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unmadini yashoda 111
-🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-111] ▪
🔅मईया कभी भी किसी भी समय मेघों मेँ बिजली चमकने पर पुकार उठती है---'वह रहा-वह रहा कन्हैया। वह उसका पीतपट चमका। वह मेघों की ओट मेँ छिपा मेरा लाल झाँक रहा है।'
▪'कन्हैया! आजा लाल! तू मथुरा जाकर जादूगर बन गया है?' मईया पुचकारती है-मेरे पास आजा! यह मईया तो तुम्हारे पास इन मेघों तक नहीँ आ सकती।'
🔅'भद्र है।' कभी कुछ क्षण,कभी थोड़ी देर ऐसे ही पुचकारेगी-बुलायेगी और फिर नेत्र बन्द करके बैठ जाती। तब अपने हाथ अपने नेत्रों के पास ऐसे ले जाकर मुट्ठी बन्द कर लेती, जैसे कन्हैया ने पीछे से आकर मईया की पीठ से चिपककर अपनी हथेलियों से इसके नेत्र बंद किये हो और यह कन्हैया के दोनों हाथ पकड़कर जानबूझकर दूसरे बालकों के नाम एक-एक करके ले रही हो-'तोक है, विशाल है, अंशु है, अर्जुन है।
▪'इनमेँ कोई नही है? दाऊ है?' मईया धीरे धीरे हँसती है--'उहूँ क्या? कोई नहीँ है, तब बन्दर है।'
🔅देर तक इसी उमंग मेँ रहती। यह सर्वथा कल्पित उमंग है, ऐसा कहना कठिन है; क्योँकि अभी उस दिन मईया ने सो कर उठते ही पुकारा--'अरे कौन है? यहाँ तो आओ।'
▪कई सेविकाएँ दौड़ी आती। मईया ने सब से कहा--'मेरी शय्या के वस्त्र सूँघकर देखो तो सही। फिर से सब कहोगी कि मैँ स्वप्न देख रही थी। कन्हैया अभी मेरे रोकते-रोकते भी बाबा के पास गोष्ठ मेँ भाग गया है। रात्रि मेँ तो मेरे लाल को मईया के बिना नीँद नहीँ आती।'
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪
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