Friday, 11 December 2015

unmadini yashoda 115

🔆            [जय गौर हरि]              🔆

▪         [उन्मादिनी यशोदा-115 ]   ▪

🔅ब्रज मेँ सहस्त्रश: बालक हैं। नन्दब्रज की ही नहीँ,दूसरे गाँवों की भी बालिकाएँ हैँ। न बालकों को न बालिकाओं को समूह बनाकर आना है। वियोग से व्याकुल व्यक्ति एकान्त चाहता है या समूह बनाता है। अतिथि-अभ्यागत के सत्कार मेँ व्यस्त न हो तो रात्रि मेँ भी अनेक बार कोई बालक या बालिका इसके अंक मेँ सिसकती सोती रहे, यह साधारण बात है। दिन मेँ तो यह कई-कई बच्चों को एक साथ सम्हालती ही रहती है।

▪यह बालक बालिकाएँ अन्तत: क्योँ रोते हैँ? क्योँ व्याकुल होते हैँ,यह भी क्या कहने-पूछने की बात है। इनके अतिरिक्त भी कम निमित्त कहाँ हैँ जो मईया को अपने कन्हैया का स्मरण दिलाते हैँ। कन्हैया नहीँ है,यह स्मरण दिलाते हैँ। आँधी आयेगी,पानी आयेगा,शीत या गर्मी पड़ेगी इसे कोई रोका जा सकता है?

🔅गायें , बछड़े-बछड़ियाँ, कुत्ते,बिल्लियाँ,बन्दर,मयूर,काक सब है। पता नहीँ ओर कितने पशु-पक्षी हैँ। इन सबको ब्रजराज के आँगन मेँ ही मंडराते रहना है। बार बार भाग आते हैँ। इन सबको ब्रज से बाहर भगा देने की बात कोई सोच सकता है? मईया को तो यह सब इसके कन्हैया का स्मरण कराते हैँ।

▪गोपराज का सदन है। इसमेँ दूध, दही माखन तो भरा ही रहेगा। रस्सियाँ इधर-उधर पड़ी ही रहेँगी। ऊखल को उठाकर कहीँ फेँका जा नहीँ सकता। घर मेँ ही अभी धरी है कन्हैया की वंशी, अनेक पटुके मोहन के मईया ने सम्हाल कर रखे हैँ। मयूरपिच्छ तो ब्रज मेँ वृक्षों के नीचे भी मिल जाते हैँ। यह तो ब्रजेश्वर का सदन है।

🔅यह सब न भी हो तो ऐसी कोई वस्तु हैँ ब्रज मेँ जिसको देखकर कन्हैया का स्मरण न हो? यहाँ की एक एक वस्तु मेँ,तृण पत्ते मेँ तो उस नील सुन्दर का स्पर्श बसा है। एक-एक प्राणी उसका अपना है। पशु पक्षी ही नहीँ,कीट भृंग, तितलियाँ तक उसका स्मरण कराती हैँ। मईया की दृष्टि जिधर उठेगी, उसे अपने लाल का स्मरण कराने वाली ही वस्तुएँ तो मिलती हैँ।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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unmadini yashoda 114

🔆            [जय गौर हरि]              🔆

▪        [उन्मादिनी यशोदा-114]     ▪

🔅वनमाला के विषम वियोग ने मईया को उन्मादिनी बना दिया है। मईया सोते-जागते, प्रभात-मध्याह्र, सायं तथा रात्रि मेँ भी अपने कन्हैया की धुन मेँ निमग्न रहा करती है।

▪बाबा से, गोपों से,गोपियों से,सबसे मईया अत्यन्त दीन अनुरोध चलता ही रहता है-'मेरा कन्हैया खो गया है। उसे ढ़ूँढ़कर ला दो। मैँ उसके बिना मणिहीना सर्पिणी हो रही हूँ। मुझे ही कोई उसके समीप पहुँचा दो।'

🔅मईया ने कभी जाना नहीं कि वह ब्रजेश्वरी हैँ। इसमेँ प्रभुत्व का स्वर कभी प्रकट नहीँ हुआ; किन्तु कन्हैया के वियोग ने तो इसे कंगालिनी बना दिया है। सेवकों तक से गिड़गिड़ाती रहती है।

▪मईया कितनी भी उन्मादिनी हो, यही आश्रय है ब्रज के सब बालकों, बालिकाओं की और अतिथियों, ऋषि-मुनियों ,ब्राह्म्णों की सेवा-सत्कार मेँ इससे किञ्चित भी त्रुटि नहीँ हो सकती।

🔅ऋषि मुनि आते ही रहते हैँ। अतिथि कोई इधर से निकलता,  उसे सीधे ब्रजराज की पौरि पूछते आना है। मईया को सबसे अपने कन्हैया के लिए आशीर्वाद चाहिए और आशीर्वाद तो उत्तम सत्कार करके ही पाया जा सकता है।

▪चातुर्मास मेँ अतिथि नहीँ आते; किन्तु तब ब्रज मेँ आकर चातुर्मास करने वाले महात्माओँ का समुदाय होता है। दूसरे दिनों मेँ ऐसा कोई ही अन्धड़-वर्षा का,दुर्दिन होता है, जब बाबा के यहाँ कोई अतिथि न आये। मईया को इस सत्कार मेँ सदा व्यस्त रहना है।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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unmadini yashoda 113

भाग 113 अभी नही मिल पाया

unmadini yashoda 112

🔆          [जय गौर हरि]            🔆

▪        [उन्मादिनी यशोदा-112]  ▪

🔅 मईया की शय्या के वस्त्र सूँघने की किसी को आवश्यकता नहीँ है। यह गन्ध भी क्या त्रिभुवन मेँ छिपती है। यह तुलसी-मिश्रित नीलकमल-सी विचित्र दिव्य गन्ध-श्यामसुन्दर के श्रीअंग की इस गन्ध को भी क्या पहिचानना है? गोपियाँ, सेविकाएँ केवल चकित सी देखती रह जाती हैँ। किसी के समीप इसका कोई समाधान नहीँ है।

▪इससे भी अद्‌भुत चकित करने की बात-मईया पुकार रही है, पुचकार रही है--'कन्हैया! मेरे लाल! डर मत। भाग मत। मैँ तुझे मारुँगी नहीँ। तुझे नहीँ बांधुंगी। कुछ नहीँ कहुँगी तुझे। क्या हुआ जो दही फैल गया। तू भूखा है। कलेऊ कर ले लाल।'

🔅कक्ष मेँ दही फैला पड़ा है और दही मेँ भीगे नन्हें चरणों के चिन्ह द्वार तक चले गये हैँ। ये बज्र, ध्वज, अंकुश, पद्य के चिन्ह और किसी बालक के ब्रज मेँ हैँ? संसार मेँ किसी और के चरणों मेँ सुने गये हैँ? इन चिन्हों को मईया ने कल्पना से तो नहीँ बनाया होगा। मईया इन चिन्हों के सम्बन्ध मेँ जो कहती है, वह कोई समझ मेँ आने की बात है।

▪'मैँ दधि-मन्थन करते करते तनिक दूध देखने चली गयी थी। मुझे क्या पता था कि कन्हैया इतने मेँ जाग जायगा। उसे तो मैँ सोता छोड़कर उठी थी। वह उठकर आया होगा। मईया को कुछ अद्‌भुत नहीँ लगता-'इतने बड़े मटके मेँ उझककर माखन देखने लगा होगा। चपल तो है ही, हाथ डालता होगा। मटका उलट गया। अब डरकर भाग गया है।'

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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unmadini yashoda 111

-🔆          [जय गौर हरि]            🔆

▪        [उन्मादिनी यशोदा-111]   ▪

🔅मईया कभी भी किसी भी समय मेघों मेँ बिजली चमकने पर पुकार उठती है---'वह रहा-वह रहा कन्हैया। वह उसका पीतपट चमका। वह मेघों की ओट मेँ छिपा मेरा लाल झाँक रहा है।'

▪'कन्हैया! आजा लाल! तू मथुरा जाकर जादूगर बन गया है?' मईया पुचकारती है-मेरे पास आजा! यह मईया तो तुम्हारे पास इन मेघों तक नहीँ आ सकती।'

🔅'भद्र है।' कभी कुछ क्षण,कभी थोड़ी देर ऐसे ही पुचकारेगी-बुलायेगी और फिर नेत्र बन्द करके बैठ जाती। तब अपने हाथ अपने नेत्रों के पास ऐसे ले जाकर मुट्‌ठी बन्द कर लेती, जैसे कन्हैया ने पीछे से आकर मईया की पीठ से चिपककर अपनी हथेलियों से इसके नेत्र बंद किये हो और यह कन्हैया के दोनों हाथ पकड़कर जानबूझकर दूसरे बालकों के नाम एक-एक करके ले रही हो-'तोक है, विशाल है, अंशु है, अर्जुन है।

▪'इनमेँ कोई नही है? दाऊ है?' मईया धीरे धीरे हँसती है--'उहूँ क्या? कोई नहीँ है, तब बन्दर है।'

🔅देर तक इसी उमंग मेँ रहती। यह सर्वथा कल्पित उमंग है, ऐसा कहना कठिन है; क्योँकि अभी उस दिन मईया ने सो कर उठते ही पुकारा--'अरे कौन है? यहाँ तो आओ।'

▪कई सेविकाएँ दौड़ी आती। मईया ने सब से कहा--'मेरी शय्या के वस्त्र सूँघकर देखो तो सही। फिर से सब कहोगी कि मैँ स्वप्न देख रही थी। कन्हैया अभी मेरे रोकते-रोकते भी बाबा के पास गोष्ठ मेँ भाग गया है। रात्रि मेँ तो मेरे लाल को मईया के बिना नीँद नहीँ आती।'

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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unmadini yashoda 110

🔆          [जय गौर हरि]            🔆

▪        [उन्मादिनी यशोदा-110]  ▪

🔅मईया का वीणा-बिनिन्दक स्वर,इसका यह तन्मय होकर पुलकित गायन ! यही स्वर,यही गायन है कि इसके आरम्भ होते ही आकाश मेँ उड़ते पक्षी तक मईया के आँगन मेँ उतर आते थे। दूर कूदते , खेलते बन्दर सब छोड़कर दौड़ आते थे। मईया के आँगन मेँ गोपियोँ का ही नहीँ, पशु-पक्षियोँ तक का ठट्ट लग जाता था। सब नीरव, सब निस्पन्द, सब तन्मय जैसे सब मूर्तियाँ होँ। मईया जब अपने गायन से सचेत होती थी तो अपने आँगन की भीड़ देखकर मुस्करा उठती थी। गोपियोँ से पूछती कि वे क्योँ आयी हैँ। पशु-पक्षियोँ को, बन्दरोँ को कुछ आहार देने को उठाती--'तुम सबको भूख लगी है? तुम बोलकर क्योँ नहीँ माँगते।'

▪कोई भी गोपी कहती मईया हम सब और यह सब भी आपका गीत सुनने आये हैं।

🔅'चल! बन्दर और पक्षी गीत सुनते होँगे।' मईया को यह भी नहीँ लगता था कि गोपियाँ भी सचमुच उसका गायन सुनने आयीँ हैं। मईया दूसरे के लिए कभी कहाँ गाती है। यह तो कहती है--'मुझे कहाँ गाना आता है। मैँ तो यूँ ही गुनगुना रही थी।'

▪अब वही स्वर, वही कण्ठ, वही संगीत; किन्तु गोपियाँ अश्रु पोँछती हैँ। पक्षी उड़ना त्यागकर पंखोँ मेँ मुख दुबका लेते हैँ। बन्दर तक मुख लटलाकर बैठ जाते हैँ। लताएँ आँसू के समान पुष्प, पत्ते गिराने लगती हैँ। लेकिन मईया को कोई टोकने का साहस नहीँ कर पाता। इस दुखिया का यह दो क्षण का सुख''''।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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unmadini yashoda 109


🔆          [जय गौर हरि]            🔆

▪       [उन्मादिनी यशोदा-109]  ▪

🔅 गोपियों मेँ चर्चा चल पड़ती है--'बेचारी वृषभानु-नन्दिनी! इस घर मेँ बहू होकर आने की कितनी आशा, कितनी उमंग थी उसमेँ। वह भुवनसुन्दर,कुसुम-कोमल भोली बालिका। कन्हैया कितना सम्मान करता था उसका। अब उसकी ओर देखा नहीँ जाता। वह तो कमल-पत्र पर की बूँद हो रही है, अब ढुलकी तब ढुलकी। उससे कीर्तिरानी तक आश्वासन के भी दो शब्द नहीँ कह पातीँ। कहीँ उसकी कोई सखी आ जाय इतने मेँ? गोपियोँ को यह आशंका कम्पित कर देती है।

▪बरसाने की बालिकाएं भी व्याकुल होने पर इन ब्रजेश्वरी के अंक मेँ ही तो मुख छिपाकर रुदन करने भागती हैं। इनका यह उंमग संगीत सुन कर ह्रदय फटे बिना रहेगा? इस गायन की तनिक चर्चा कीर्तिकुमारी के कानोँ मेँ पड़ जाय तो प्राण बचेँगे उनके?

🔅मईया को रोका भी नहीँ जा सकता। इतना निर्दय कोई कैसे होगा कि इस दुनिया का यह चार क्षण का मानसिक सुख भी इससे छीन ले।

▪मईया गाती है। ऐसे ही किसी मनोभ्रम की उमंग मेँ गाती है। तब तक गाती है-जब तक निर्दय नियति इसे उस भ्रम से सचेत न करदे।

🔅अपने ही तकिये पर झीना दुकूल डालकर उसे अंक से सटाये,अथवा उससे सटी बैठी,उसे थपथपाते,उसे अपना नन्हा पुत्र समझकर मईया अनेक बार उसे सुलाने का प्रयत्न करती लोरी गाती है---

▪सो जा! सो जा मेरे मुन्ने,मेरे! कुँवर कन्हाई सो जा।

▫अरे, जुन्हैय मेरे आँगन तुझे सुलाने आयी॥

▪चिड़िया सोयीँ, मोर सो गए, सोए सभी कबूतर।

▫मईया सोयी-बछड़े सोये,सोये तरु पर बन्दर॥

▪आ जा,आ जा,निँदियारानी मोहन तुझे बुलाता।

▫तू आयी क्या? लाल को मेरे आयी अहो जम्हाई॥

▪मेरा श्याम सो रहा अपनी सुन्दर पलकें मूँदे।

▫पंखा झल दूँ, झलकी मुखपर नन्हीँ-नन्हीँ बूँदे॥

▪मैँने त्रिभुवन की निधि पाई,मेरे सो जा कुँवर कन्हाई॥

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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unmadini yashoda 108

🔆           [जय गौर हरि]            🔆

▪        [उन्मादिनी यशोदा-108]  ▪

▫ 'विवाह करेगा, विवाह करेगा।

▪गोपाललाल मोहन विवाह करेगा॥

▫वृषभानुनन्दिनी-सी बहू अहा, वरेगा।

▪कीर्तिरानी मोहन की मनुहार करेँगी॥

▫मेरी बहू की सखियाँ मेरा आँगन भरेँगी।

▪सुख, शोभा, सौन्दर्य सभी से गेह भरेगा।

▫मेरा लाल मनोरथ मेरे पूरा करेगा॥

▪पैर छुएगी दोनों कर मेँ आँचल लेकर राधा।

▫जुगजुग जीए मोहन मेरा मुझे कौन सी बाधा॥

▪साध मेरी सब जीवन की पूरी करेगा।

▫गोपाल लाल मोहन, विवाह करेगा॥

🔅मईया ताली बजा-बजाकर गा रही है। इतनी आनन्द मग्न से गा रही है कि जैसे अभी उठकर नाचने लगेगी। गोपियों को आश्चर्य नहीँ है; किन्तु वह सब जान-बूझकर तनिक दूर हट जाती हैँ। सब जानती हैँ कि ब्रजेश्वरी इस समय ऐसा समझती है कि उनका लाल वन मेँ गोचारण करने गया है।

▪'इतनी उमंग, इतनी अभिलाषा और विधाता ने कितनी निष्ठुरता की इनके साथ!' गोपियाँ छिपाकर आँसू पोँछती हैं। जानती हैँ कि उनकी स्वामिनी की यह उमंग देर तक नहीँ टिक सकती।

🔅अभी क्रूर विधाता कोई निमित्त भेज देगा और जब इन्हेँ स्मरण आयेगा कि इनके गोपाल लाल मोहन तो ब्रज मेँ ही नहीँ हैँ, इस उमंग के मग्न होने की व्यथा कितनी दारुण होगी।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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unmadini yashoda 107

🔆           [जय गौर हरि]            🔆

▪        [उन्मादिनी यशोदा-107]  ▪

🔅मईया तनिक गम्भीर दीखने लगती है। 'मैँ कन्हैया को स्पर्श नहीँ कर सकूँगी? नहीँ स्पर्श तो नहीँ करुँगी। भूतनी उसे कैसे स्पर्श करेगी?'

▪मईया फिर हँसने लगती और कहती है--'मैँ उसे देख सकूँगी। देखती रहूँगी और वह मुझे नहीँ देखेगा। वह अपने काम मेँ लगा रहेगा। उसे पता भी नहीँ लगेगा कि उसकी मईया उसके समीप ही है।'

🔅सबके समीप मईया को सावधान करने की यही बात है--वह सुनेगा कि आपने उनके वियोग मेँ देह त्याग दिया, तब ?

▪'कौन कहेगा उससे? द्वारिका तो सुना बहुत दूर है।' मईया जैसे कुछ सोचने लगती है--'भूत प्रेतों को तो दूर जाने मेँ श्रम नहीँ होता? मुझे कौन सा वहाँ जाकर फिर यहाँ लौटना है। मुझे कोई ऐसी अकेली जाने नहीँ देता। कोई मुझे मेरे लाल तक ले नहीँ जाता। मैँ मरकर भूतनी बनूँगी, तब मुझे कोई रोक नहीँ सकेगा।'
'मैँ कन्हैया के समीप जाऊँगी। कोई मुझे रोक नहीँ सकेगा। मईया हँस रही है, हँसे जा रही है। रुदन से भी भयानक इनकी हँसी-गोपियाँ , सेविकाएँ, स्तब्ध,भीत,शंकित हैं। समझ नहीँ पाती हैँ कि वे अपनी स्वामिनी को कैसे सावधान करेँ। ब्रजेश्वर को बुलाये बिना उपाय नहीँ।

🔅बाबा भरे कंठ से कहते हैँ--'महर! तुम मुझे छोड़कर चली जाओगी?'

▪'महर! इस ब्रज मेँ धरा क्या है? तुम भी चलो। 'मईया हँस रही है--'हम कन्हैया के पास जायँगे। हम दोनों मरकर भूत-भूतनी बनकर उसके पास चलेँगे।'

🔅बाबा अपना अमोघमन्त्र दुहराते हैँ--महर! वह आयेगा-यहाँ ही आयेगा।' और सुनेगा कि मेरे वियोग मेँ मेरे बाबा और मईया रो-रोकर, तड़प-तड़प-कर मर गये, तब क्या दशा होगी उसकी?'

▪'नहीँ! नहीँ!नहीँ!' मईया चीत्कार कर उठती है। इसका हास्य विदा हो जाता है।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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unmadini yashoda 106

🔆            [जय गौर हरि]            🔆
▪        [उन्मादिनी यशोदा-106] ▪

🔅भगवान भूतनाथ के मुख्यगणों मेँ भी कोई ऐसे नहीँ हैँ जो मईया की छाया भी छू सके, सामान्य भूतप्रेत चर्चा व्यर्थ है। मईया का जो कोई स्मरण करेगा और वहाँ भूत-प्रेत टिकेगा? मईया भूतनी हो तो ब्रह्मा की सृष्टि मर्यादा बनी रहेगी? लेकिन मईया यह सब सुनने-समझने की स्थिति मेँ नहीँ है।

▪गोपी बेचारी मईया को समझाना चाहती है कि --'मैँने अनेक मुनियों से सुना है कि आपके लाल का स्मरण करते जो शरीर छोड़ता है, वह उनके लोक जाता है।'

🔅मईया हँसती हुई कहती है--'उसका लोक क्या? वह कहीँ द्वारिका मेँ ही तो है।' मैँ भूतनी होकर उसके समीप ही जाना चाहती हूँ।

▪'कन्हैया चलेगा तो मैँ उसका पथ बुहार दिया करुँगी। कोई मुझे नहीँ देखेगा।' मईया अपनी धुन मेँ है--'वह धूप मेँ निकलेगा तो मेघ बनकर उस पर छाया किये चलूँगी। वह सो जायेगा तो उसे व्यजन करुँगी। मैँ उसे देखती रहूँगी-देखती रहूँगी, पर वह मुझे नहीँ देखेगा। मैँ उसके लिए तनिक भी बाधा नहीँ बनूँगी।'

🔅'मैँ उसके आँगन मेँ कोकिल बनकर कुकूंगी। मैना बनकर 'कन्हैया' कहकर उसे पुकारुँगी। मईया हँसी जा रही है। इसे अपने लाल के सान्निध्य मेँ भूतनी बनकर पहुँच जाने की कल्पना बहुत विचित्र, बहुत सुखद लगती है।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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unmadini yashoda 105

🔆           [जय गौर हरि]            🔆

▪       [उन्मादिनी यशोदा-105]  ▪

🔅वियोग और हास्य? वेदना मेँ हँसी? समझ मेँ आता है कुछ? समझ मेँ आये या न आये: किन्तु मईया हँसती है, अनेक बार हँसती है। विचित्र हँसी हँसती है , हँसने लगेगी तो देर तक हँसती ही रहेगी।

▪मईया का स्वभाव कभी खुलकर हँसने का नहीँ यह तो केवल मुस्कराती है; किन्तु यदि कभी हँस पड़े तो लगता है कि चाँदी की घंटियाँ बज उठी हैँ। मईया की दन्तपंक्ति की किरणों से उस समय इनके लाल के पतले अधर दुग्धोज्वल हो उठते हैँ। अनेक बार शैशव मेँ कन्हैया इन्हेँ इसलिए गुदगुदाता था कि इनकी मधुर हास्य-ध्वनि सुनने को मिले।

🔅गोपियाँ कहती हैँ--'कन्हैया को माता-पिता से रंग-रुप कुछ नहीँ मिला है; किन्तु हँसी इन्हेँ अपनी माता की मिली है। ब्रजेश्वरी जैसी ही मधुर हास्य-ध्वनि और वही दन्तकान्ति।'

▪मईया को अपने लाल की कोई बात स्मरण आती हो और यह तब हँसती हो, ऐसी बात नहीँ है । यह तो ऐसी बातें सोचकर हँसने लगती है कि इनका हास्य इनके रुदन से अधिक आशंकाप्रद हो गया है।

🔅मईया गोपी से पूछती है---'क्यो री! मैँ ऐसे ही मर जाऊँ तो भूतनी बनूँगी? सुना है कि जिसका मन यहीँ किसी मेँ लगा रहता है, वह मरकर भूत बनता है।' मेरा लाल मुझसे डरेगा तो नहीँ?'

▪गोपी कातर होकर कहती है-'आप यह सब क्या सोचने लगी हैँ?'

🔅मईया हँसने लगी है-मैँ अपने कन्हैया को डराऊँगी नहीँ।' मैँ उसका स्पर्श भी नहीँ करुँगी। भूतनी के स्पर्श से तो अनिष्ट होता है: किन्तु मैँ भूतनी बनूँगी।'

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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unmadini yashoda 104

🔆           [जय गौर हरि]            🔆

▪       [उन्मादिनी यशोदा-104]  ▪

🔅 गोपियाँ व्याकुल होकर इधर-उधर दौड़ती हैं। कन्हैया का पटुका,वंशी,मयूरपिच्छ जैसा कुछ लाकर मईया के सामने करती हैँ और कहती हैं --'ब्रजेश्वरी! यह क्या है? इसे पहचानती हो?'

▪मईया अपने लाल के वस्त्र,वंशी,आभरण नहीँ पहिचानेगी? वह झपट लेती है और दोनोँ हाथों से ह्रदय से दबा लेती है--'कन्हैया!'

🔅मईया फिर भी चेतना-शून्य हो जाती है। प्राय: ऐसे समय मेँ इसकी शून्यता दूसरों को कम आशंकित करती है। अश्रु प्रवाह नेत्र के कोनों से चलने लगता है। शरीर से स्वेदधारा भी चलती है और कम्प भी होता है। लेकिन रोम-रोम उत्थित हो जाता है।देह से जैसे प्रकाश की किरणें फूटने लगती हैं। अंगकान्ति बहुत बढ़ जाती है। कभी-कभी मुख की ज्योति इतनी बढ़ जाती है कि इसकी ओर देखा नहीँ जाता। वैसे तब भी संज्ञा शून्य ही रहती है।

▪सेविकाएँ, गोपियाँ भी चकित देखती रह जाती हैँ। इस अवस्था मेँ मईया को स्पर्श करना,हिलाना,पुतारना कुछ सम्भव नहीँ होता। गोपियों को लगता है कि मईया मेँ कोई देवी आविष्ट हो गयी है। वह हाथ जोड़ती हैं, भूमि पर मस्तक पर प्रणाम करती हैँ। इन सबको कौन समझाये कि मईया से बड़ी कोई देवी कहीँ है ही नहीँ। यह स्वयं महाशक्ति है।

🔅मईया की शून्यता कितनी देर रहेगी, कोई कह नहीँ सकता। कभी बहुत देर भी होती है।तब गोपियाँ इसके चारों और एकत्र हो जाती हैं ताली बजा-बजाकर गाने लगती हैं--

🔺'नीलमणि श्यामसुन्दर गोपाल गोविन्द!'

▪यह कीर्तन मईया को सचेत करता है। बहुत धीरे-धीरे संज्ञा  लौटती है। इधर-उधर देखेगी और शिथिल स्वर मेँ पूछती--'कन्हैया गोचारण करने गया? मुझे क्या हो गया था? तुम सबने जगाया क्योँ नहीँ? वह कलेऊ कर गया?

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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unmadini yashoda 103

🔆           [जय गौर हरि]            🔆

▪        [उन्मादिनी यशोदा-103]

🔅मईया कहती है--'मेरा लाल मेरे अत्याचारों से दुखी होकर चला गया। मैँने उसे कितना-कितना डाँटा। मैँ गर्व मेँ फूली उस पर प्रतिबन्ध लगाती ही चली गयी। यहाँ मत जा, वहाँ मत जा, यह मत कर, वह मत कर, ऐसे रह, वैसे रह! फूट गया मेरा भाग्य!' मईया मेँ जब कोई मनोवेग उमड़ता है, तब वेदना की कोई सीमा नहीँ रह जाती है।

▪मैँ कितनी इतरा उठी थी। मुझे क्या पता था कि कन्हैया मेरा नहीँ हैँ।' मईया का ह्रदय इस बात को सह नही सकता इसलिए छटपटाकर संज्ञाशून्य हो जाती है।

🔅बाबा के समीप तो कहने को  यही है--'महर! कन्हैया आयेगा। वह हमारा ही है;किन्तु वह तुम्हेँ इस अवस्था मेँ देखे, यह चाहती हो?'

▪वह आ रहा है? आ रहा है मेरा कन्हैया!' मईया का शरीर पार्थिव है, यह समझने वाला बहुत भ्रम मेँ रहेगा। पार्थिव शरीर क्षण मेँ ऐसा रक्तमांसहीन कंकाल जैसा और क्षण मेँ सुन्दर, सुपुष्ट होता रह सकता है?

🔅जब चाहे मईया का शरीर पीपल के पत्ते के समान काँपने लगता है और कहती--कन्हैया कहाँ हैँ ? नेत्र तो इसके कदाचित सूखते ही नहीँ। रोम-रोम से वारिधारा ही नहीँ; रक्तस्त्राव तक होने लगता है और जब शरीर का कम्प रुकता है, इसे हिलाते रहो, संज्ञा का नाम नहीँ। नेत्र खुले हैं;किन्तु कुछ देखते नहीँ हैँ।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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unmadini yashoda 102

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▪       [उन्मादिनी यशोदा-102]  ▪

🔅वियोग भी योग की भाँति समाधि देता है। वि+योग,  योग से विशेष होने से ही तो इसे वियोग कहा गया है। यम-वियोग, आसन, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान के क्रम से साधन करने पर योग मेँ समाधि की उपलब्धि होती है; किन्तु वियोग की तीव्रता प्रत्येक स्थिति मेँ समाधि दे देती है। आप भले इसे भाव-समाधि कह लेँ।

▪जाग रहे हैँ, निद्रा नहीँ है,मनोलय भी नहीँ है, परन्तु शरीर का ध्यान नहीँ है। कोई इन्द्रिय से कोई सूचना मन ग्रहण नहीँ कर रहा है और अपनी ऊहापोह मेँ भी नहीँ है। इसी अवस्था का नाम समाधि है या और कुछ ?

🔅मईया न तो समाधि जानती और न भावसमाधि। वह तो बैठी-बैठी या खड़े भी अद्भुत शून्यता को प्राप्त हो जाती है। खड़ी हो तो सूखे काठ के समान गिर पड़ती है।

▪मईया कहती है--'मैँ भाग्यहीना हूँ। त्रिभूवन मेँ अलभ्य मणि मैँने पायी थी और उसे खो दिया!' मईया का श्रीमुख श्वेत पड़ जाता है जैसे शरीर मेँ एक बूंद भी रक्त न हो। बैठी हो या खड़ी, नेत्र पथराने लगते हैं। संज्ञा लुप्त हो जाती है।

🔅सेविकाएँ भागती हैँ श्री ब्रजराज को बुलाने। इतनी ही विपत्ति नहीँ है। चाहे जब मईया का सिंदूर-विनिन्दक अंग नीला पड़ने लगता है। सम्पूर्ण शरीर रक्तहीन, शुष्क, काला पड़ जाता है। जैसे अग्नि मेँ अधजला काष्ठ हो।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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unmadini yashoda 101

🔆           [जय गौर हरि]            🔆

▪       [उन्मादिनी यशोदा-101]  ▪

🔅मईया को कोई नहीँ कहेगा कि दाऊ सखाओं से भी मिलने मेँ संकोच ही करते हैँ और गोपकुमार भी तो कभी इनके साथ खुलकर खेलने के अभ्यासी नहीँ हैँ। कन्हैया के बिना दाऊ बहुत गम्भीर हो जाते हैँ ताकि मित्रों को भी संकोच हो ,इतने गम्भीर और यह तो इनका पुराना स्वभाव है। अत: सखा भी प्रणाम करके गोचारण मेँ ही लग जाया करते हैँ।

▪मईया को उठते ही धुन चढ़ती है-'-दाऊ को वन मेँ जाने से पहले कलेऊ कराना है। स्वयं दधि-मन्थन करके नवनीत निकालती है। स्वयं रसोई करती है और रात्रि मेँ व्यालू कराती है।' दाऊ के लिए जो कुछ चाहिए, मईया दूसरे किसी को करने नहीँ देती।

🔅'गोपियों मेँ से अनेक पूछती हैँ--बड़ा भाई आ गया, छोटा कब आयेगा?'

▪'इन्हीँ दोनों पर तो द्वारिका निर्भर है, पता नहीँ कितने शत्रु दाँव लगाये रात-दिन देखते रहते हैँ। दोनों एक साथ कैसे आ सकते हैँ। 'मईया को यह सोचना या जानना नहीँ पड़ा। यह तो उत्साह से कहती है--'दाऊ आ गया है। यह जायेगा तब कन्हैया आयेगा।'

🔅मईया का उत्साह, मईया का दुख दाऊ के आने से ऐसे दूर हो गया जैसे कभी था ही नहीँ। मईया तो उत्साह मेँ आ गयी। इसे दिन रात दाऊ की ही धुन रहने लगी है।

▪दाऊ दो महीने रहकर गया;किन्तु मईया को उत्साह मिल गया--'अब कन्हैया आयेगा।'

🔅'दाऊ पहुँच गया होगा द्वारिका? कितनी दूर है द्वारिका? कन्हैया चल पड़ा होगा?' मईया के प्राणों मेँ यह प्रतीक्षा जाग पड़ी है।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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