🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-99] ▪
🔅बज मेँ द्वारिका से दाऊ आये। ब्रज मेँ आकर अनुभव हुआ कि छोटे भाई को छोड़कर आना अच्छा नहीँ हुआ,किन्तु अब तो आ गये। दाऊ के बिना कन्हैया परिपूर्ण नहीँ होता, परन्तु कन्हैया के बिना दाऊ तो जैसे शरीर मात्र रह जाता है। इनकी आत्मा कन्हैया, ब्रज की आत्मा कन्हैया तो द्वारिका मेँ ही रह गया।
▪जब दाऊ ब्रज मेँ आए तो सबने ह्रदय से स्वागत किया; किन्तु ब्रज के जन-जन के अन्तर मेँ जो प्रश्न था-'कन्हैया नहीँ आया? कब आयेगा?' इसका उत्तर कहाँ था दाऊ के पास। वह भी 'आयेगा ही' तो कह सकते थे;किन्हेँ उसे स्वयं उस उत्तर से सन्तोष हो सकता था?
🔅बड़े गोप, वृद्धाएँ, बाबा का वात्सल्य मिला। सखाओं को अङ्कमाल दी। गोपकुमारियों ने सलज्ज, ससंकोच प्रणाम किया। कोई कहे भले कुछ नहीँ; किन्तु सबके नेत्रों मेँ, सबके रोम रोम में जो अत्यन्त कातर प्रश्न था--उससे दाऊ के प्राण छटपटा उठते थे। इस प्रश्न का उत्तर,इस आर्ति को आश्वासन देना भी उनके समीप नहीँ था।
▪गोप-कुमारियों का एक वर्ग था--दाऊ की अपनी प्रेयसियों का वर्ग। यह बालिकाएँ बाल्यकाल से ही बहुत मानिनी थीँ। इनका निर्णय था--'कन्हैया तो श्रीराधा के पीछे पागल हो गया है। वह दूसरी किसी से हास-परिहास भले करले,तनिक उसे छेड़ भले ले; किन्तु श्रीराधा के अतिरिक्त इसकी दूसरी कोई प्रिया हो नहीँ सकती।
🔅अच्छे तो दाऊ जी भी बहुत हैँ। गम्भीर हैँ और जो सम्मुख हो,उसी को समुचित स्नेह देते हैँ। उनकी प्रीति प्राप्त हो जाय तो कन्हैया भी विनीत हो जाता है। वह परिहास,छेड़छाड़ तो करता ही रहेगा और श्रीराधा को भी विनम्र रहना पड़ेगा। वह भी तब स्वामिनी की ठसक नहीँ रख सकेंगी।'
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪
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