🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-106] ▪
🔅भगवान भूतनाथ के मुख्यगणों मेँ भी कोई ऐसे नहीँ हैँ जो मईया की छाया भी छू सके, सामान्य भूतप्रेत चर्चा व्यर्थ है। मईया का जो कोई स्मरण करेगा और वहाँ भूत-प्रेत टिकेगा? मईया भूतनी हो तो ब्रह्मा की सृष्टि मर्यादा बनी रहेगी? लेकिन मईया यह सब सुनने-समझने की स्थिति मेँ नहीँ है।
▪गोपी बेचारी मईया को समझाना चाहती है कि --'मैँने अनेक मुनियों से सुना है कि आपके लाल का स्मरण करते जो शरीर छोड़ता है, वह उनके लोक जाता है।'
🔅मईया हँसती हुई कहती है--'उसका लोक क्या? वह कहीँ द्वारिका मेँ ही तो है।' मैँ भूतनी होकर उसके समीप ही जाना चाहती हूँ।
▪'कन्हैया चलेगा तो मैँ उसका पथ बुहार दिया करुँगी। कोई मुझे नहीँ देखेगा।' मईया अपनी धुन मेँ है--'वह धूप मेँ निकलेगा तो मेघ बनकर उस पर छाया किये चलूँगी। वह सो जायेगा तो उसे व्यजन करुँगी। मैँ उसे देखती रहूँगी-देखती रहूँगी, पर वह मुझे नहीँ देखेगा। मैँ उसके लिए तनिक भी बाधा नहीँ बनूँगी।'
🔅'मैँ उसके आँगन मेँ कोकिल बनकर कुकूंगी। मैना बनकर 'कन्हैया' कहकर उसे पुकारुँगी। मईया हँसी जा रही है। इसे अपने लाल के सान्निध्य मेँ भूतनी बनकर पहुँच जाने की कल्पना बहुत विचित्र, बहुत सुखद लगती है।
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪
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