🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-96] ▪
🔅 वह अंग-गन्ध, वह कान्ति, वह स्वभाव कोई भी कहाँ-से पाये? उद्धव आये ब्रज मेँ। यह कन्हैया के चचेरे भाई ही हैँ। कन्हैया ने अपनी धोती, पटुका,वनमाला पहिनाकर भेजा। उद्धव भी श्यामवर्ण,विशाल अरुणाभ-लोचन है; लेकिन मयुर मुकुटी की शोभा, उसका स्वभाव तो सृष्टि मेँ अन्यत्र सम्भव नहीँ है।
▪देवगुरु बृहस्पति के साक्षात शिष्य उद्धव बहुत उत्साह से, बड़ी आशा से,बहुत गम्भीर होकर ब्रज मेँ आये थे। ब्रज के सरल गोप-गोपियों को समझा देना उन्हेँ अत्यंत सरल लगता था। उद्धव यदुकुल के प्रधानमन्त्री की गम्भीरता, गौरव के साथ आये थे। पहली रात्रि बाबा को उन्होँने उसी गम्भीरता से उपदेश करना प्रारम्भ भी किया था; किन्तु मईया की विह्वलता,मईया के अश्रु-प्रवाह, क्षण-क्षण पर होते इसके विवर्ण मुख को देखकर इससे बोलने का साहस ही उद्धव को नही हुआ।
🔅उद्धव तो दूसरे ही दिन बालक बन गये। उनका सब ज्ञान, सब विवेक गोपियों के ही अश्रु प्रवाह मेँ बह गया। मथुरा के महामंत्री उद्धव दूसरे दिन सायं नन्द भवन लौटे तो ब्रज के बन गये थे। मईया के चरणों मेँ गिरे। वह भी केवल 'मईया' बोल सके।
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪
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