🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-109] ▪
🔅 गोपियों मेँ चर्चा चल पड़ती है--'बेचारी वृषभानु-नन्दिनी! इस घर मेँ बहू होकर आने की कितनी आशा, कितनी उमंग थी उसमेँ। वह भुवनसुन्दर,कुसुम-कोमल भोली बालिका। कन्हैया कितना सम्मान करता था उसका। अब उसकी ओर देखा नहीँ जाता। वह तो कमल-पत्र पर की बूँद हो रही है, अब ढुलकी तब ढुलकी। उससे कीर्तिरानी तक आश्वासन के भी दो शब्द नहीँ कह पातीँ। कहीँ उसकी कोई सखी आ जाय इतने मेँ? गोपियोँ को यह आशंका कम्पित कर देती है।
▪बरसाने की बालिकाएं भी व्याकुल होने पर इन ब्रजेश्वरी के अंक मेँ ही तो मुख छिपाकर रुदन करने भागती हैं। इनका यह उंमग संगीत सुन कर ह्रदय फटे बिना रहेगा? इस गायन की तनिक चर्चा कीर्तिकुमारी के कानोँ मेँ पड़ जाय तो प्राण बचेँगे उनके?
🔅मईया को रोका भी नहीँ जा सकता। इतना निर्दय कोई कैसे होगा कि इस दुनिया का यह चार क्षण का मानसिक सुख भी इससे छीन ले।
▪मईया गाती है। ऐसे ही किसी मनोभ्रम की उमंग मेँ गाती है। तब तक गाती है-जब तक निर्दय नियति इसे उस भ्रम से सचेत न करदे।
🔅अपने ही तकिये पर झीना दुकूल डालकर उसे अंक से सटाये,अथवा उससे सटी बैठी,उसे थपथपाते,उसे अपना नन्हा पुत्र समझकर मईया अनेक बार उसे सुलाने का प्रयत्न करती लोरी गाती है---
▪सो जा! सो जा मेरे मुन्ने,मेरे! कुँवर कन्हाई सो जा।
▫अरे, जुन्हैय मेरे आँगन तुझे सुलाने आयी॥
▪चिड़िया सोयीँ, मोर सो गए, सोए सभी कबूतर।
▫मईया सोयी-बछड़े सोये,सोये तरु पर बन्दर॥
▪आ जा,आ जा,निँदियारानी मोहन तुझे बुलाता।
▫तू आयी क्या? लाल को मेरे आयी अहो जम्हाई॥
▪मेरा श्याम सो रहा अपनी सुन्दर पलकें मूँदे।
▫पंखा झल दूँ, झलकी मुखपर नन्हीँ-नन्हीँ बूँदे॥
▪मैँने त्रिभुवन की निधि पाई,मेरे सो जा कुँवर कन्हाई॥
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪
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