Friday, 11 December 2015

unmadini yashoda 101

🔆           [जय गौर हरि]            🔆

▪       [उन्मादिनी यशोदा-101]  ▪

🔅मईया को कोई नहीँ कहेगा कि दाऊ सखाओं से भी मिलने मेँ संकोच ही करते हैँ और गोपकुमार भी तो कभी इनके साथ खुलकर खेलने के अभ्यासी नहीँ हैँ। कन्हैया के बिना दाऊ बहुत गम्भीर हो जाते हैँ ताकि मित्रों को भी संकोच हो ,इतने गम्भीर और यह तो इनका पुराना स्वभाव है। अत: सखा भी प्रणाम करके गोचारण मेँ ही लग जाया करते हैँ।

▪मईया को उठते ही धुन चढ़ती है-'-दाऊ को वन मेँ जाने से पहले कलेऊ कराना है। स्वयं दधि-मन्थन करके नवनीत निकालती है। स्वयं रसोई करती है और रात्रि मेँ व्यालू कराती है।' दाऊ के लिए जो कुछ चाहिए, मईया दूसरे किसी को करने नहीँ देती।

🔅'गोपियों मेँ से अनेक पूछती हैँ--बड़ा भाई आ गया, छोटा कब आयेगा?'

▪'इन्हीँ दोनों पर तो द्वारिका निर्भर है, पता नहीँ कितने शत्रु दाँव लगाये रात-दिन देखते रहते हैँ। दोनों एक साथ कैसे आ सकते हैँ। 'मईया को यह सोचना या जानना नहीँ पड़ा। यह तो उत्साह से कहती है--'दाऊ आ गया है। यह जायेगा तब कन्हैया आयेगा।'

🔅मईया का उत्साह, मईया का दुख दाऊ के आने से ऐसे दूर हो गया जैसे कभी था ही नहीँ। मईया तो उत्साह मेँ आ गयी। इसे दिन रात दाऊ की ही धुन रहने लगी है।

▪दाऊ दो महीने रहकर गया;किन्तु मईया को उत्साह मिल गया--'अब कन्हैया आयेगा।'

🔅'दाऊ पहुँच गया होगा द्वारिका? कितनी दूर है द्वारिका? कन्हैया चल पड़ा होगा?' मईया के प्राणों मेँ यह प्रतीक्षा जाग पड़ी है।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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