🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-98] ▪
🔅मईया का उद्धव के सम्बन्ध मेँ अपना समाधान था। 'यह अन्तत: कन्हैया का ही तो मित्र है। क्या हुआ कि तनिक गम्भीर है; किन्तु उसके समान इसे भी वन की ही पड़ी रहती है। न भोजन का ध्यान रहता है, न विश्राम का।'
▪मईया को उद्धव के रहते समय की भी चिन्ता कम नहीँ तंग करती थी-'बहुत सवेरे वन मेँ चला गया। कलेऊ करके भी नहीँ गया। अब रात मेँ थक-थकाकर लौटेगा और आते ही सोने लगेगा।'
🔅मईया उद्धव के लिए कलेऊ, छाक भेजने की चिन्ता करती रहती है। श्री ब्रजराज से कहती है-'यह तुम्हारे मित्र का लड़का दो दिन को आया। अब यह गाय चराने जाय, क्या ऐसा उचित है?
▪बाबा बार-बार समझाते हैं -महर! 'उद्धव गायें चराने नही जाता लेकिन उसको कहीँ घूमने से रोकना भी तो उचित नहीँ है।'
🔅मईया को विश्वास ही नहीँ होता कि उद्धव गोचारण करने नही जाता। 'गायें चराने नहीँ जाता तो वन-वन क्योँ दिनभर भटकता है?' यह भी बालकों के साथ कन्हैया के समान गायों के पीछे भटकने का व्यसनी है।
▪यह तो नगर का है। यहीँ आकर वन मेँ गये बिना नहीँ रह पाता कन्हैया नगर मेँ कैसे रहता होगा? कितना उदास रहता होगा? मईया की चिन्ता उद्धव के आने से बढ़ी ही है।
🔅'कन्हैया यहाँ से चला गया, यही आश्चर्य की बात है।' उद्धव ब्रज आकर इस निश्चय पर आ गये हैँ।' कन्हैया को यहाँ आना ही चाहिए। यहाँ की प्रेम-प्रतिमाओं को त्यागकर उनका कहीँ कोई काम नहीँ है। मथुरा और मथुरा के लोग नष्ट भी होते होँ तो भी आना चाहिए।
▪गोप-कुमारियों की बात उद्धव समझ ही नहीँ पाते जब वह कहती हैं--कन्हैया गया ही कहाँ है। वह हमेँ छोड़ कही अन्यत्र जाता ही नहीँ।
🔅मईया कहती है उद्धव मेरे लाल से ऐसा कुछ मत कहना। बड़ा संकोची है। उसे प्रसन्न रहना चाहिए। मईया की बात उद्धव थोड़ी समझ पाता है-थोड़ी सी; क्योँकि मईया चाहती है कि ब्रज मे कोई कन्हैया के बिना दुखी भी है,यह कोई कभी उससे न कहे।
▪मईया तो उद्धव के जाने के पीछे भी बहुत दिनों तक स्मरण करती रही--'वह बृहद्वल भी तो फिर नहीँ आया। कन्हैया से उसने क्या कहा होगा?'
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪
🔆▪🔆▪🔅▪🔆▪🔆
No comments:
Post a Comment