Friday, 11 December 2015

unmadini yashoda 108

🔆           [जय गौर हरि]            🔆

▪        [उन्मादिनी यशोदा-108]  ▪

▫ 'विवाह करेगा, विवाह करेगा।

▪गोपाललाल मोहन विवाह करेगा॥

▫वृषभानुनन्दिनी-सी बहू अहा, वरेगा।

▪कीर्तिरानी मोहन की मनुहार करेँगी॥

▫मेरी बहू की सखियाँ मेरा आँगन भरेँगी।

▪सुख, शोभा, सौन्दर्य सभी से गेह भरेगा।

▫मेरा लाल मनोरथ मेरे पूरा करेगा॥

▪पैर छुएगी दोनों कर मेँ आँचल लेकर राधा।

▫जुगजुग जीए मोहन मेरा मुझे कौन सी बाधा॥

▪साध मेरी सब जीवन की पूरी करेगा।

▫गोपाल लाल मोहन, विवाह करेगा॥

🔅मईया ताली बजा-बजाकर गा रही है। इतनी आनन्द मग्न से गा रही है कि जैसे अभी उठकर नाचने लगेगी। गोपियों को आश्चर्य नहीँ है; किन्तु वह सब जान-बूझकर तनिक दूर हट जाती हैँ। सब जानती हैँ कि ब्रजेश्वरी इस समय ऐसा समझती है कि उनका लाल वन मेँ गोचारण करने गया है।

▪'इतनी उमंग, इतनी अभिलाषा और विधाता ने कितनी निष्ठुरता की इनके साथ!' गोपियाँ छिपाकर आँसू पोँछती हैं। जानती हैँ कि उनकी स्वामिनी की यह उमंग देर तक नहीँ टिक सकती।

🔅अभी क्रूर विधाता कोई निमित्त भेज देगा और जब इन्हेँ स्मरण आयेगा कि इनके गोपाल लाल मोहन तो ब्रज मेँ ही नहीँ हैँ, इस उमंग के मग्न होने की व्यथा कितनी दारुण होगी।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

🔆▪🔆▪🔅▪🔆▪🔆

No comments:

Post a Comment