Friday, 11 December 2015

unmadini yashoda 112

🔆          [जय गौर हरि]            🔆

▪        [उन्मादिनी यशोदा-112]  ▪

🔅 मईया की शय्या के वस्त्र सूँघने की किसी को आवश्यकता नहीँ है। यह गन्ध भी क्या त्रिभुवन मेँ छिपती है। यह तुलसी-मिश्रित नीलकमल-सी विचित्र दिव्य गन्ध-श्यामसुन्दर के श्रीअंग की इस गन्ध को भी क्या पहिचानना है? गोपियाँ, सेविकाएँ केवल चकित सी देखती रह जाती हैँ। किसी के समीप इसका कोई समाधान नहीँ है।

▪इससे भी अद्‌भुत चकित करने की बात-मईया पुकार रही है, पुचकार रही है--'कन्हैया! मेरे लाल! डर मत। भाग मत। मैँ तुझे मारुँगी नहीँ। तुझे नहीँ बांधुंगी। कुछ नहीँ कहुँगी तुझे। क्या हुआ जो दही फैल गया। तू भूखा है। कलेऊ कर ले लाल।'

🔅कक्ष मेँ दही फैला पड़ा है और दही मेँ भीगे नन्हें चरणों के चिन्ह द्वार तक चले गये हैँ। ये बज्र, ध्वज, अंकुश, पद्य के चिन्ह और किसी बालक के ब्रज मेँ हैँ? संसार मेँ किसी और के चरणों मेँ सुने गये हैँ? इन चिन्हों को मईया ने कल्पना से तो नहीँ बनाया होगा। मईया इन चिन्हों के सम्बन्ध मेँ जो कहती है, वह कोई समझ मेँ आने की बात है।

▪'मैँ दधि-मन्थन करते करते तनिक दूध देखने चली गयी थी। मुझे क्या पता था कि कन्हैया इतने मेँ जाग जायगा। उसे तो मैँ सोता छोड़कर उठी थी। वह उठकर आया होगा। मईया को कुछ अद्‌भुत नहीँ लगता-'इतने बड़े मटके मेँ उझककर माखन देखने लगा होगा। चपल तो है ही, हाथ डालता होगा। मटका उलट गया। अब डरकर भाग गया है।'

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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