Friday, 11 December 2015

unmadini yashoda 103

🔆           [जय गौर हरि]            🔆

▪        [उन्मादिनी यशोदा-103]

🔅मईया कहती है--'मेरा लाल मेरे अत्याचारों से दुखी होकर चला गया। मैँने उसे कितना-कितना डाँटा। मैँ गर्व मेँ फूली उस पर प्रतिबन्ध लगाती ही चली गयी। यहाँ मत जा, वहाँ मत जा, यह मत कर, वह मत कर, ऐसे रह, वैसे रह! फूट गया मेरा भाग्य!' मईया मेँ जब कोई मनोवेग उमड़ता है, तब वेदना की कोई सीमा नहीँ रह जाती है।

▪मैँ कितनी इतरा उठी थी। मुझे क्या पता था कि कन्हैया मेरा नहीँ हैँ।' मईया का ह्रदय इस बात को सह नही सकता इसलिए छटपटाकर संज्ञाशून्य हो जाती है।

🔅बाबा के समीप तो कहने को  यही है--'महर! कन्हैया आयेगा। वह हमारा ही है;किन्तु वह तुम्हेँ इस अवस्था मेँ देखे, यह चाहती हो?'

▪वह आ रहा है? आ रहा है मेरा कन्हैया!' मईया का शरीर पार्थिव है, यह समझने वाला बहुत भ्रम मेँ रहेगा। पार्थिव शरीर क्षण मेँ ऐसा रक्तमांसहीन कंकाल जैसा और क्षण मेँ सुन्दर, सुपुष्ट होता रह सकता है?

🔅जब चाहे मईया का शरीर पीपल के पत्ते के समान काँपने लगता है और कहती--कन्हैया कहाँ हैँ ? नेत्र तो इसके कदाचित सूखते ही नहीँ। रोम-रोम से वारिधारा ही नहीँ; रक्तस्त्राव तक होने लगता है और जब शरीर का कम्प रुकता है, इसे हिलाते रहो, संज्ञा का नाम नहीँ। नेत्र खुले हैं;किन्तु कुछ देखते नहीँ हैँ।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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