Friday, 11 December 2015

unmadini yashoda 111

-🔆          [जय गौर हरि]            🔆

▪        [उन्मादिनी यशोदा-111]   ▪

🔅मईया कभी भी किसी भी समय मेघों मेँ बिजली चमकने पर पुकार उठती है---'वह रहा-वह रहा कन्हैया। वह उसका पीतपट चमका। वह मेघों की ओट मेँ छिपा मेरा लाल झाँक रहा है।'

▪'कन्हैया! आजा लाल! तू मथुरा जाकर जादूगर बन गया है?' मईया पुचकारती है-मेरे पास आजा! यह मईया तो तुम्हारे पास इन मेघों तक नहीँ आ सकती।'

🔅'भद्र है।' कभी कुछ क्षण,कभी थोड़ी देर ऐसे ही पुचकारेगी-बुलायेगी और फिर नेत्र बन्द करके बैठ जाती। तब अपने हाथ अपने नेत्रों के पास ऐसे ले जाकर मुट्‌ठी बन्द कर लेती, जैसे कन्हैया ने पीछे से आकर मईया की पीठ से चिपककर अपनी हथेलियों से इसके नेत्र बंद किये हो और यह कन्हैया के दोनों हाथ पकड़कर जानबूझकर दूसरे बालकों के नाम एक-एक करके ले रही हो-'तोक है, विशाल है, अंशु है, अर्जुन है।

▪'इनमेँ कोई नही है? दाऊ है?' मईया धीरे धीरे हँसती है--'उहूँ क्या? कोई नहीँ है, तब बन्दर है।'

🔅देर तक इसी उमंग मेँ रहती। यह सर्वथा कल्पित उमंग है, ऐसा कहना कठिन है; क्योँकि अभी उस दिन मईया ने सो कर उठते ही पुकारा--'अरे कौन है? यहाँ तो आओ।'

▪कई सेविकाएँ दौड़ी आती। मईया ने सब से कहा--'मेरी शय्या के वस्त्र सूँघकर देखो तो सही। फिर से सब कहोगी कि मैँ स्वप्न देख रही थी। कन्हैया अभी मेरे रोकते-रोकते भी बाबा के पास गोष्ठ मेँ भाग गया है। रात्रि मेँ तो मेरे लाल को मईया के बिना नीँद नहीँ आती।'

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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