🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-93] ▪
🔅कालिन्दी भले द्वारिका में पट्टमहिषी हो लेकिन ब्रज मेँ तो इनमेँ प्रत्यक्ष होने का साहस नहीँ है। यहाँ तो इस द्रवरुप मेँ ही सेवा का सुअवसर मिल सकता है। अत: इन्हेँ यहाँ सब संकोच नीरव इस नीर रुप मेँ सहना ही है। मईया तो स्नान करके दूध चढ़ाती,चन्दन,पुष्प से पूजा करती और नैवेद्य अर्पित करके नीराजन के अतिरिक्त प्रणाम भी करती।
▪यमुना का कुछ संकोच दूर होता है जब मईया भगवान भास्कर को अञ्जलि तथा लाल करवीर पुष्प की अञ्जली देने लगती है। मईया को कोई द्वारिका के सम्बन्ध सूचित भी कर दे तो यह मान लेगी? यह तो बार बार स्मरण कराने पर भी भूल जाती है कि इनका कन्हैया अब माता का स्तनपान करने जितना छोटा नहीँ है। यह तो यहाँ स्नान-पूजन करते भी बीच मेँ चौँकती है--'कन्हैया जाग गया होगा।वह भूखा होगा।'
🔅सेविकाएँ सम्हालती और शीतकाल की ठिठुरता मेँ वस्त्र डालती है तो मईया झल्लाती और कहती है-कन्हैया अपनी कमरिया भी नहीँ ले गया है और तुम सब मुझ बुढ़िया को ही बचाने मेँ मरी जा रही हो। तुम सब समझती क्योँ नहीँ हो कि रोग,मृत्यु सबको मेरी जैसी भाग्यहीना के समीप आते भय लगता है। मुझे कुछ होने का भय नहीँ है।'
▪'आज विशेष पर्व है, एकादशी। मईया को एकादशी अथवा प्रदोष,कालाष्टमी या गणेश चतुर्थी का कब स्मरण आयेगा ,कोई ठीक से नही कह सकता। जब चाहे स्नान करने को उद्यत हो जाती।
🔅सेविकाएं स्मरण दिलाती हैं मईया--आपने आज स्नान तो कर लिया है। अभी कल आपने चतुर्थी का व्रत किया था,आज ही एकादशी कैसे हो जायेगी?'
▪मईया शिथिल होगी या दूसरा पर्व सोच लेगी,यह भी निश्चित नहीँ है।
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪
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