Saturday, 14 November 2015

unmadini yashoda 93

🔆            [जय गौर हरि]            🔆

▪       [उन्मादिनी यशोदा-93]  ▪

🔅कालिन्दी भले द्वारिका में पट्टमहिषी हो लेकिन ब्रज मेँ तो इनमेँ प्रत्यक्ष होने का साहस नहीँ है। यहाँ तो इस द्रवरुप मेँ ही सेवा का सुअवसर मिल सकता है। अत: इन्हेँ यहाँ सब संकोच नीरव इस नीर रुप मेँ सहना ही है। मईया तो स्नान करके दूध चढ़ाती,चन्दन,पुष्प से पूजा करती और नैवेद्य अर्पित करके नीराजन के अतिरिक्त प्रणाम भी करती।

▪यमुना का कुछ संकोच दूर होता है जब मईया भगवान भास्कर को अञ्जलि तथा लाल करवीर पुष्प की अञ्जली देने लगती है। मईया को कोई द्वारिका के सम्बन्ध सूचित भी कर दे तो यह मान लेगी? यह तो बार बार स्मरण कराने पर भी भूल जाती है कि इनका कन्हैया अब माता का स्तनपान करने जितना छोटा नहीँ है। यह तो यहाँ स्नान-पूजन करते भी बीच मेँ चौँकती है--'कन्हैया जाग गया होगा।वह भूखा होगा।'

🔅सेविकाएँ सम्हालती और शीतकाल की ठिठुरता मेँ वस्त्र डालती है तो मईया झल्लाती और कहती है-कन्हैया अपनी कमरिया भी नहीँ ले गया है और तुम सब मुझ बुढ़िया को ही बचाने मेँ मरी जा रही हो। तुम सब समझती क्योँ नहीँ हो कि रोग,मृत्यु सबको मेरी जैसी भाग्यहीना के समीप आते भय लगता है। मुझे कुछ होने का भय नहीँ है।'

▪'आज विशेष पर्व है, एकादशी। मईया को एकादशी अथवा प्रदोष,कालाष्टमी या गणेश चतुर्थी का कब स्मरण आयेगा ,कोई ठीक से नही कह सकता। जब चाहे स्नान करने को उद्यत हो जाती।

🔅सेविकाएं स्मरण दिलाती हैं मईया--आपने आज स्नान तो कर लिया है। अभी कल आपने चतुर्थी का व्रत किया था,आज ही एकादशी कैसे हो जायेगी?'

▪मईया शिथिल होगी या दूसरा पर्व सोच लेगी,यह भी निश्चित नहीँ है।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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unmadini yashoda 92

🔆           [जय गौर हरि]            🔆

▪        [उन्मादिनी यशोदा-92]  ▪

🔅शीतकाल मेँ भी मईया को अपने शरीर की सुधि नहीँ रहती। स्नान करते कभी मूर्ति की भाँति स्थिर खड़ी रहती और कभी व्याकुल होकर इधर-उधर देखती रहती। सेविकाएँ सम्हाल कर न निकालेँ तो मईया जल मेँ ही खड़ी रहती और स्नान करना है, यह स्मरण मेँ नहीँ रहता।

▪मईया अनेक बार हाथ जोड़कर अञ्चल फैलाकर प्रार्थना करने लगती है--'आप सूर्य-तनूजा हो। मैँ वत्सहीना गौ जैसी हो गयी हूँ। मेरा कन्हैया मुझसे खो गया। वह भले दूर चला गया: किन्तु वहाँ सुखी रहे,प्रसन्न रहे।'

🔅कोई गोपी यह कह भी दे --'कन्हैया लौट आये' तो मईया शीघ्रता से घूमकर उसकी ओर देखती और कहती--वह तो आयेगा ही; किन्तु कोई संकोच उठाकर, कुछ भी हानि करके क्योँ आये? देवता उसके मन पर दबाव डाले--यह तू क्योँ चाहती है?

▪यमुना प्रत्यक्ष होकर बोल पाती तो मईया के चरण पकड़कर यही तो कहती--'माँ! मैँ तो तुम्हारे पुत्र के चरणों की सेविका हूँ। तुम्हारे चरणों का स्पर्श मिलता है, यही मेरा सौभाग्य है , तुम्हारी चरण रज के प्रसाद से उनकी प्रीति पाने की स्वयं आशा करती हूँ। कोई देवता नहीँ जो तुम्हारे लाल को प्रभावित करने की बात सोच सके। सब उनकी कृपा के ही याचक हैँ।'

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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unmadini yashoda 91

🔆        [जय गौर हरि]            🔆

▪       [उन्मादिनी यशोदा-91]     ◾

🔅विशेष पर्व भी प्रत्येक दिन पहुँचे रहते हैँ,ऐसा विचित्र विधान है। मईया को शीतकाल मेँ भी पर्व पर यमुना-स्नान ही करना है और ये पर्व ऐसे है कि सब मनाओ तो एक दिन कई -कई हैँ।

▪वैशाख,श्रावण,कार्तिक,मार्गशीर्ष,माघ यह पूरे मास प्रात: स्नान के पर्व है। सप्ताह का प्रत्येक दिन किसी ग्रह का है,प्रत्येक तिथि किसी देवता की है। इसके अतिरिक्त विशेष पर्व से रिक्त कोई दिन नहीँ। मईया के विशेष पर्व और भी अधिक हैँ। कभी उनके कन्हैया की जन्मतिथि है,कभी जन्मनक्षत्र है। कन्हैया की न हो तो दाऊ की,श्री ब्रजराज की,भद्र की, तोक की किसी-न किसी के निमित्त विशेष पर्व है।

🔅पर्व है तो प्रात: सूर्योदय से पूर्व यमुनास्नान भी करना ही है। मईया उठते ही चिन्ता करती--'मेरे कन्हैया को ठंड लग जायगी।'

▪सेविकाओँ को अनेक बार याद कराना पड़ता है--आपका लाल अब बड़ा हो गये हैँ। मईया को तो यही लगता रहता है कि उनका कन्हैया अभी स्तनपान ही करता है। बाबा के साथ वह स्नान करने चला गया? मईया यमुना तट पहुचँकर पुकारती--'कन्हैया! दाऊ!'

🔅अब मईया को स्मरण आता है कि उनका अंकधन तो ब्रज मेँ ही नहीँ है। मेरा लाल यहीँ पुलिन पर खेलता था। उसे इस कालिन्दी मेँ स्नान करना बहुत प्रिय लगता था। सखाओँ के साथ पानी उछालते जल से निकलना ही नहीँ चाहता था।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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unmadini yashoda 90

🔆          [जय गौर हरि]            🔆

▪       [उन्मादिनी यशोदा-90]  ◾

🔅काक जब भिन्न ढंग से बोलता है तो मईया का ह्रदय  कापँता है--'यह कोई अशुभ तो नहीँ सूचित करता!

◾मईया कहती है--'काक! कुछ अनर्थ होने वाला हो तो मेरा होने दो लेकिन मेरे कन्हैया को कुछ नहीँ होना चाहिए। तुम मेरे सिर पर बैठ जाओ। मुझ दुखिया के लिए तो मृत्यु भी वरदान है।'जैसे अनर्थ कौए के नियन्त्रण मेँ ही हो!

🔅सेविकाएँ कातर कंठ से कहती है-'मईया आप ऐसी अमंगल बात क्यो मुख से निकालती हैँ?'

◾अमंगल बात? मैँने किसी के  लिए कुछ अमंगल कह दिया है क्या ? मईया इतनी भोली है कि इसे अपनी बात का भी ध्यान नहीँ रहता। यह काक कुछ कह रहा है।

🔅कोई सेविका कह देती-'यह तो अपने साथियो को आपकी रोटी खाने का निमन्त्रण दे रहा है। दूसरा कुछ कहे भी क्या ?

◾मईया फिर कौए से अनुरोध करती लगती है-मुझ दुखिया पर तनिक दया करो। तनिक उड़कर देखो और मुझे बताओ कि मेरा लाल आ रहा है? मैँ अपने उस अंकधन के बिना अन्धी हो रही हूँ।'

🔅आज काक मेरे पूछने मेँ आ बैठा था। काक कहीँ उसी समय तनिक उड़कर बैठ जाय तो मईया उसके बैठने का अर्थ जो मिलेगा,उसीसे पूछती रहती--कन्हैया इस आँगन मेँ आयेगा?'

◾मईया का मन मथित हो रहा है--'आज काक मेरे पूछने पर उड़कर चला ही गया। वह मुझसे रुठ गया क्या? मुझसे तो दैव ही रुठा है काक। तुम मुझसे क्योँ रुठते हो?'

🔅मईया को काक की प्रत्येक चेष्टा मेँ कोई सन्देश जान पड़ता है,किन्तु यह सन्देश समझ  नहीँ पाती,यह बड़ी उलझन है। जिस-तिस से पूछती रहती है। कोई तो काक चेष्टा का अर्थ जानती होगी। कोई इसे इसके मन की बात कहेगी ?'

◾काक,खञ्जन प्रभृति अनेक पक्षी हैँ जिनकी चेष्टा, बोली, जिनके दर्शन की दशा ,स्थिति  से शकुन,अशकुन देखने की प्रथा है। इनमेँ से प्रत्येक को देखकर मईया के मन मेँ एक ही बात उठती है-कन्हैया आ रहा है? वह मिलेगा मुझे ?'

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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unmadini yashoda 89

🔆          [जय गौर हरि]            🔆

▪        [उन्मादिनी यशोदा-89]  ▪

🔅वियोग सभी को बहुत संवेदनशील बना देता है। मईया तो है ही भावनामयी। यह तो नीलकण्ठ,श्वेतचील देखते ही पता नहीँ क्या-क्या सोचने लगती है।

▪मईया को अब काक बहुत प्रिय हो गये हैँ। कोई काक आँगन मेँ आ बैठे तो यह उसके लिए तत्काल रोटी,दही ले आती।पता नहीँ कब किसने काक बोली से शकुन देखने की प्रथा प्रचलित की;किन्तु दूरस्थ प्रियजन के मिलन को आसन्न सूचना काक बोलकर देता है,यह मान्यता बहुत प्राचीन है। गाँवो के लोगो का जीवन ऐसी असंख्य मान्यताओं को लेकर चलता है। ब्रज मेँ सरल विश्वासी लोग है। मईया विश्वास की मूर्ति है। अत: काक को देखकर इसमेँ आशा,उमंग जागती है और कहती है--'काक! तुम भले आये। मेरा कन्हैया आ रहा है?' मईया जागती ही रहती है,क्योकि काक तो दिनभर आँगन मेँ आते रहते हैँ।

🔅मईया अनुरोध करती है-'तनिक उड़कर बैठो तो सही! मेरा लाल चल पड़ा है?' ऐसे अनुरोध करती है,जैसे काक इनकी बात समझता है।

▪मईया काक को पता नहीँ कितने प्रलोभन देती है--'तुम बहुत अच्छे हो। मैँ प्रतिदिन तुम्हेँ दूध-भात खिलाया करुँगी। तुम्हारी चोँच से मढ़वा दूँगी। तुम्हारे पैरो मेँ रत्ननूपुर पहिनाऊँगी। मेरा कन्हैया कब आयेगा कुछ बताओ तो!'

🔅भवन मेँ जो गोपियाँ,सेविकाएँ होगी, मईया सबको बुलाती और कहती--'आज काक पता नहीँ कितने प्रकार के शब्द कर रहा है। श्री ब्रजेश्वर तक को बुलाने भेजती--सुनो तो सही,यह क्या कह रहा है? मेरा कन्हैया सुखी और प्रसन्न है?'

▪मईया नहीँ समझती कि काक शावक कुछ भिन्न प्रकार का शब्द भी माता-पिता को पुकारने के लिए करते है। यदि खाद्य सामग्री हो तो कौए अपने वर्ग को पुकार पुकारकर बुलाते हैँ। लेकिन मईया यह सब कहाँ सुनती है।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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unmadini yashoda 88

🔆          [जय गौर हरि]            🔆

▪        [उन्मादिनी यशोदा-88]  ▪

🔅पक्षी अपना सिर पंखो मेँ छिपाकर बैठते है तो मईया उनसे पूछती है-'कन्हैया ने तुम्हेँ खिझा दिया है? मेरे लाल से रुठकर आये हो।' वह तो चपल है। अपने सखाओँ से भी झगड़ लेता है;किन्तु किसी सखा का रुठना तो सह नहीँ सकता। तुम चले आये,वह तुम्हेँ अवश्य ढ़ूँढता होगा। मेरे लाल से रुठो मत। मैँ तुम्हेँ अभी खिलाती हूँ।' उसे आशीर्वाद देना।

▪मईया पक्षियो को कहती हैँ--तुम्हारे तो पंख हैँ। तुम कन्हैया के पास उड़कर जा सकते हो। नगर मेँ उसके पास न भी उतर सको तो उसे दूर से देख सकते हो।'

🔅मईया बहुधा दुख-कातर हो उठती है--'तुम पर विधाता का अनुग्रह है। मुझे देखो कि मैँ कितनी विवशा हूँ। मुझ पंखहीना दुखिया को कोई मेरे कन्हैया के समीप पहुँचाता नहीँ है। मैँ उसका कमल-मुख देखे बिना ऐसे ही घुट-घुटकर मर जाऊँगी।'

▪मईया बहुत शीघ्र हड़बड़ा उठती है--'नही,यह सब उससे मत कहना। वह बहुत सुकुमार है। बड़ा कोमल ह्रदय है उसका। बहुत शीघ्र उसके कोमल-लोचनो से अश्रु गिरने लगते हैँ। उसे ऐसा कुछ मत कहना जिससे वह दुखी हो। मेरा क्या है,मेरे दिन किसी प्रकार बीत ही जा रहे हैँ।

🔅मईया कभी तो सुध-बुध भूली रहती है। अपने तकिये को थपकाना छोड़कर आँगन मेँ आती और कहती है--'वह अभी सो रहा है अभी-अभी सोया है।' तुम सब बहकाना पुकारना मत। मैँ तुम सबको चारा-चुग्गा डालती हूँ। चुपचाप खाओ। हाँ,मेरे पास बैठो,पर कन्हैया को जगाओ मत।'

▪सेविकाओँ का पशुओँ के समान पक्षियो के प्रति आक्रोश नहीँ है। इनको भी लगता है कि पक्षी कन्हैया के समीप होकर आते हैँ। मईया को यह आश्वासन देते हैँ।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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unmadini yashoda 87

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unmadini yashoda 86

🔆          [जय गौर हरि]            🔆

▪       [उन्मादिनी यशोदा-86]  ▪

🔅विहंग मयूर भी है भले वह बहुत कम उड़ पाता हो। ब्रज मेँ तो मयूरो ने गोपियों के आँगनो  मेँ घूमते रहना,नाचते रहना अपना स्वभाव बना लिया है। लेकिन नन्द बाबा का आँगन तो इतने पक्षियो से भरा रहता है कि उनकी जाति पहिचानना कठिन है।

▪कन्हैया सूतिका गृह से बाहर आया और पक्षियो का आकर्षण केन्द्र हो गया। पक्षी उसके पालने पर बैठे रहते थे और उड़ाने पर भी वहीँ फुर्र-फुर्र उड़ते रहते थे। वह घुटनेँ सरकने लगा तब से तो पक्षियो  का समूह सचमुच पक्षी--कन्हैया का पक्षपाती हो गया। अपनी भाषा मेँ उससे पता नहीँ क्या कहते रहते और उसके आसपास ही फुदकते रहते थे।

🔅अब कन्हैया ब्रज मेँ नहीँ है तो भी पक्षियो का समूह ब्रजराज का आँगन नहीँ छोड़ता है। उलटे इनकी संख्या बढ़ ही गयी है। पता नहीँ यह अब किस आशा मेँ यहीँ मंडराते रहते हैँ।

▪मईया पक्षियो को दाने डालती है।आँगन मेँ फल रखती है। पक्षी कितने ढीठ हो गये हैँ कि जब चाहे तब मईया के कन्धोँ पर बैठ जाते है। यदि यह बैठी मिल जाय तब मयूर ही नहीँ हंस भी इसकी गोद मेँ बैठकर सो जाना चाहते है।

🔅'तुम कन्हैया के समीप से आये हो?' मईया को लगता है कि पक्षी इसके लाल से मिलकर ही आते हैँ।मईया ने सुन रखा है कि हंस सन्देश-वाहक बना करते है।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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unmadini yashoda 85

🔆          [जय गौर हरि]            🔆

▪       [उन्मादिनी यशोदा-85] ▪

🔅 गोपियाँ पशुओँ पर खीझती हैँ-'यह ब्रजेश्वरी को तनिक भूले भी नहीँ रहने देते।'

▪मईया बैठकर पशुओँ पर हाथ फिराते-फिराते स्वयं कन्द्रन करने लगती है--'मैँ उसे कहाँ से लाऊँ? वह ब्रज मेँ है ही कहाँ।'

🔅'कन्हैया आयेगा-अवश्य आयेगा।' महर कहते है कि वह आयेगा। वह झूठ तो बोलते ही नहीँ। कभी ऐसे आश्वासन देती है,थपकाती सहलाती है,जैसे यह पशु भी बालक यां बालिका हो और उसकी बात समझते हो।

▪'तुम सब इतने दुर्बल हो। तुम्हेँ देखकर कन्हैया दुखी हो जायगा। मईया इनको कुछ-न-कुछ खिलाने का प्रयत्न करती है-'वह तो तुमसे स्नेह करता है। तुम्हारे साथ खेलता है। तुम दुर्बल रहोगे तो तुम्हेँ देखकर स्वयं रो पड़ेगा। कुछ नही खाओगे तो उसके साथ कैसे खेल सकोगे?'

🔅मईया  में वात्सल्य अनन्त है। इस वियोग की विषम पीड़ा मेँ भी इसका वात्सल्य असीम हैँ। यह किसी प्राणी को दुखी नहीँ देख पाती।दधि, दूध, नवनीत, मोदक पता नहीँ क्या-क्या उठाकर लाती रहेगी और प्रयत्न करेगी कि प्रत्येक पशु कुछ खाय।

▪मईया को यह भी स्मरण नहीँ रहता है कि बिल्ली याँ व्याघ्र तृण नहीँ खा सकते अथवा मृग,शशक दूध नहीँ पीते। यह तो गोपियो  को, सेविकाओँ को समझाते, बतलाते रहना है मईया को।

🔅मईया के करो से दिया दधि याँ नवनीत मृग भी तनिक चाट ही लेते हैँ। व्याघ्र-केहरी भी मोदक या रोटी खा लेते हैँ। मईया के वात्सल्य ने ही इन सबको जीवित रखा है;किन्तु सेविकाएँ सन्तुष्ट नहीँ इन पशुओँ से--'यह स्वामिनी को तनिक तो भूले रहने देते!'किन्तु यह अबोध मूक पशु--इन पर क्रोध कैसे किया जा सकता हैँ। 

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

unmadini yashoda 84

🔆          [जय गौर हरि]            🔆

▪        [उन्मादिनी यशोदा-84]  ▪

🔅 बिल्लियाँ ही नहीँ, व्याघ्रसिँह, वाराह भी मईया का चलना कठिन कर देते हैँ। इन्हेँ न डाँटा जा सकता, न डराया जा सकता। लकुट या शाटिका उठाने पर भूमि मेँ लेट जाते हैँ। ये दुर्बल, कंकालप्राय पशु-इन पर क्रोध कैसे किया जाय? यही थे कि इनका स्वस्थ, सुचिक्कन, माँस भरा शरीर दृष्टि मुग्ध करता था और अब इनकी ओर देखा नहीँ जाता है। यह जीवित है, यही कम आश्चर्य नहीँ है।

▪दधि,नवनीत तक सूँघने का भी कोई कष्ट नहीँ करता। कुत्ते होँ या बिल्ली होँ या कोई और,किसी आहार को मुख नहीँ लगाते सब। मईया अपने करों से दे तो भले कुत्ते या बिल्लियां तनिक दधि चाट लेँ, गिलहरी, मृग आदि तृण या मोदक मेँ से कुछ खा लेँ अन्यथा दूसरे के हाथ से तो यह भी इन्हेँ स्वीकार नहीँ।

🔅'कन्हैया नहीँ आया?' सायंकाल कुत्ते, बिल्लियाँ मईया के चरणों मेँ लेट-लेटकर, बोल-बोलकर इसे भूले नहीँ रहने देते।

▪'कन्हैया वन मेँ नहीँ है?' दिन मेँ ही मृग या व्याघ्र जब भवन मेँ आकर मईया के सम्मुख लेटकर नाना प्रकार-की चेष्टा करने लगेँ तो मईया अपने लाल को भूली कैसे रहे? यह पशु उससे उसके कन्हैया का दर्शन कराने का ही तो अनुरोध करते हैँ। मईया तथा गोपियों को भी अब यह बात समझने मेँ कुछ सोचना तो नहीँ रह गया है।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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unmadini yashoda 83

श्यामाश्याम .... भाग 83 नहीँ आया है जी । आने पर उपलब्ध हो सकेगा ।।

unmadini yashoda 82

भाग 82 नहीँ आया ।।। आने पर उपलब्ध हो सकेगा ---

unmadini yashoda 81

🔆       [जय गौर हरि]           🔆

▪      [उन्मादिनी यशोदा-81] ▪

🔅मईया ब्रह्ममुहूर्त से ही पुकारने लगती है--'अतिथि आते होंगे।मेरे कन्हैया का समाचार लायेँगे।उनके स्वागत की व्यवस्था करो।कोई थोड़ी दूर जाकर देख आओ कि कोई ऋषि-मुनि आ रहे हैँ? उन्हेँ आदरपूर्वक ले आओ।'

▪मईया प्राय: श्री ब्रजेश्वर से अनुरोध करती है---'तुम जाकर देखो तो सही।कोई ऋषि-मुनि किसी और के घर आये होंगे।मैँ वहीँ चली जाऊँगी। वह मेरे कन्हैया को देखकर आये होंगे।'

🔅ऐसा नहीँ है कि मईया सदा समाचार पाने को उत्सुक ही रहती हो। ऐसा बहुत कम होता है। तब होता है,जब अपेक्षाकृत स्वस्थ रहती है। तब कहीँ बादल गरज पड़े,वर्षा होने लगे तो इसे स्मरण नही रहता कि ऋतु कौन सी है? तब हाताश हो जाती-'चातुर्मास्य आ गया। अब कोई ऋषि-मुनि कन्हैया का समाचार भी देने चार महीने नहीँ आयेगा।'

▪सेविकाएँ तो इसे चातुर्मास्य मेँ भी समझा लेती हैँ--'सब ऋषि मुनि  कहाँ चार महीने यात्रा स्थगित करते हैँ।कोई दो महीने एक स्थान पर रहते हैँ,कोई एक महीने। दिव्य लोकों  के सिद्ध तो कभी भी आ सकते हैँ। उन्हेँ कहाँ भूमि पर चलना है कि उन्हेँ चातुर्मास्य का बन्धन है।'

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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unmadini yashoda 80

🔆          [जय गौर हरि]            🔆

▪        [उन्मादिनी यशोदा-80]   ▪

🔅 विश्व का केन्द्र हो गई है द्वारिका। अत: क्या अनुचित है यदि मईया प्रत्येक अतिथि अभ्यागत से पूछती है--'मेरे कन्हैया को देखा है आपने? आपने उसके सम्बन्ध मेँ कुछ सुना है? वह सकुशल है? प्रसन्न है?

▪सच बात है कि ब्रज मेँ अधिकांश अतिथि द्वारिका होकर ही आते हैँ। जो एक बार यहाँ हो गये हैँ, वह यदि सिद्ध ऋषि मुनि हुए तो यहाँ पुन: आने से पहले द्वारिका हो आते हैँ। उन्हेँ इस ब्रजेश्वरी को द्वारिका का सम्वाद देना रहता है।

🔅जो द्वारिका पहुँचते हैँ, उन्हेँ ब्रज का, ब्रजवासियोँ का, नन्दबाबा का और मईया का इतना महात्मय सुनने को मिलता, ब्रज आये बिना उनसे रहा नहीँ जाता।

▪'पता नहीँ कैसा है ब्रज और कैसे हैँ ब्रज के लोग? 'द्वारिका के जन-जन के मुख पर प्राय: एक ही चर्चा रहती है,'हमारे वासुदेव तो वहाँ की चर्चा से ही विभोर हो जाते हैं और संकर्षण ही नहीँ महामन्त्री उद्धव जैसे साक्षात्‌ देवगुरु बृहस्पति के शिष्य भी ब्रज की चर्चा चलने पर अपने शरीर की सुधि तक विस्मृत कर बैठते हैँ।'

🔅ऋषि-मुनियों को,सिद्ध तपस्वियों को,महर्लोक,जनलोक तथा सत्यलोक के भी देवर्षि,परमर्षिवर्ग को श्रीकृष्ण के दर्शन से अधिक दूसरा कोई आकर्षण समाधि मेँ भी नहीँ रह गया है। द्वारिका जाना है इन्हेँ उन श्रीद्वारिकाधीश के दर्शन करने और द्वारिका जाने पर ब्रज की चर्चा न सुनने को मिले, सम्भव नहीँ है। द्वारिका जाने पर सबको अनुभव होता है कि ब्रज का दर्शन किये बिना उसकी द्वारिका-यात्रा अर्थहीन है। द्वारिका का सार्थक ही है ब्रज का प्रसाद।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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unmadini yashoda 79

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▪        [उन्मादिनी यशोदा-79] ▪

🔅 गोपियाँ मईया को समझाती हैं कन्हैया इस संकट मेँ मथुरा नहीँ छोड़ सकता।

▪'मैँ जाऊँगी?' मईया सुनना नहीँ चाहती कि मथुरा जाना इस समय सम्भव नहीँ है। बाबा को बहुत कठिनाई से इसे रोके रहना पड़ता है।

🔅'जरासन्ध,जरासन्ध,जरासन्ध! सुनते सुनते जैसे कान पक गये हैँ। जरासन्ध आने वाला है। जरासन्ध आ रहा है। जरासन्ध आ गया है। जरासन्ध हारकर भाग गया। मईया जरासन्ध के नाम से चिढ़ती है--'यह कंस क्या मरा,उसका श्वसुर प्रेत की भाँति मथुरा के पीछे ही पड़ गया है।'

▪इन सम्वादों मेँ लगभग अन्तिम सम्वाद ही था--'जरासन्ध के आक्रमणों से बचने के लिए दाऊ-कन्हैया मथुरा के सब लोगों को लेकर द्वारिका चले गये। वहाँ समुद्र के मध्य मेँ जा बसे हैँ।'

🔅'और करते भी क्या। जरासन्ध से पीछा तो छूटा।'

▪मईया ने उस समय जैसे सन्तोष की श्वास ली--'वे दोनों सुख पूर्वक रहेँ,सुरक्षित रहेँ। हमारा क्या है,हम कैसे भी जीवन के दिन काट लेँगे।'

🔅'द्वारिका कहाँ है? कितनी दूर है?' मईया यह जिज्ञासा भी बहुत डरते डरते करती है। द्वारिका से यहाँ के मार्ग मेँ कहीँ जरासन्ध तो नहीँ पड़ता?
'कन्हैया कैसे आयेगा?' अब सम्वाद नहीँ आते। मईया प्राय: हताश हो जाती है--'मार्ग मेँ जरासन्ध के सैनिक उसकी घात मेँ बैठे होँगे। उसे नहीँ आना चाहिए। वह सकुशल रहे।

▪मईया का आग्रह अब दूसरा है--'महर! तुम भी तो नहीँ जा सकते। तुमको जरासन्ध ने पकड़ लिया तो कन्हैया वहाँ बैठा नहीँ रह सकेगा। वह सुख से रहे।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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unmadini yashoda 78

🔆          [जय गौर हरि]            🔆

▪        [उन्मादिनी यशोदा-78]    ▪

🔅सम्वाद तो यह भी मईया तक पहुँच ही गया की कन्हैया ने कुब्जा से मैत्री करली है।

▪मईया उस दिन वियोग-व्यथा भूलकर खुलकर हँसी--'अभी उसे कछनी तो बाँधनी आती नहीँ। लेकिन यहाँ भी गोपियो के घट फोड़ देता था। कूबड़ी को चिढ़ाने मेँ उसे आनन्द आता होगा।'

🔅प्रत्येक सम्वाद का मईया अपने ढंग का अर्थ कर लेती है। लेकिन सम्वाद तो विकट आने लगे--'मथुरा पर जरासन्ध ने चढ़ाई करदी है। वह तेइस अक्षौहिणी सेना ले आया है।'

▪मईया नहीँ समझती कि अक्षौणी क्या होता है;किन्तु सुनती है--'उतनी सेना जितनी पूरे ब्रज मेँ गायेँ भी नहीँ हैँ,तो सिर पकड़कर बैठ जाती है।

🔅'दाऊ-कन्हैया ने सब सेना मार दी। अकेला जरासन्ध हारकर भाग गया। यह समाचार शीघ्र न आ गया होता तो मईया के प्राण वैसे ही निकल जाते।

▪'मथुरा के चारो ओर से रक्त की दलदल हो गई है। मुर्दे गिरिराज गोवर्धन से ऊँचे चारो ओर बिछे पड़े है। यह समाचार भी आया तो मईया को धुन चढ़ गयी--'मेरे कन्हैया को वहाँ से कैसे भी निकाल लाओ। निकाल लाओ दाऊ को,रोहिणी जीजी को।जो आ सकेँ,सबको ले आओ।' वे शव सड़ेँगे तो वहाँ बहुत दुर्गन्ध फैलेगी। उसमेँ कन्हैया कैसे रहेगा?

🔅मईया को समझाया नहीँ जा सकता कि इस समय मथुरा के लोगों के आधार ही कन्हैया हैँ।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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unmadini yashoda 77

🔆            [जय गौर हरि]            🔆
▪        [उन्मादिनी यशोदा-77]    ▪

🔅 विचित्र-विचित्र सम्वाद आते थे मथुरा के सम्बध्ध मेँ। मईया को कम से कम यह बहुत विचित्र लगते थे। सामान्य सम्वाद केवल एक आया था--'दाऊ-कन्हैया गुरुकुल मेँ अध्ययन करने गये।'

▪मईया को सन्तोष हुआ था।' कन्हैया पढ़ेगा तो सही।' वह गोपियों से कहती थी--'अवन्तिकापुरी दूर है तो क्या हुआ। वहाँ की राजमाता है दाऊ की बुआ राजाधिदेवी जी। कन्हैया अग्रज के साथ पढ़ेगा तो कुछ पढ़ लेगा। अकेला तो वह पढ़ नहीँ सकता था।

🔅 'दाऊ-कन्हैया पढ़कर गुरुकुल से लौट आये।' तीन महीने भी पूरे नहीँ हुए और यह समाचार आ गया। मईया को बहुत विचित्र लगा। इसने तो सुना है कि गुरुकुल मेँ बालक को वर्ष लगा करते हैँ।

▪कन्हैया बहुत चपल है। वह भला कैसे चुपचाप बैठकर पढ़ता? मन नहीँ लगा तो बड़े भाई के साथ भाग आया।' मईया को नहीँ लगता कि इतने अल्प समय मेँ कुछ पढ़ भी सकता है; किन्तु इससे कोई क्षोभ इसे नहीँ है--'ब्रजेश्वर के कुमार को पढ़कर करना भी क्या है? उसके सब भाई और सखा तो बिना पढ़े ही हैं।'

🔅मईया को उल्टे सन्तोष हुआ-'अब वह यहाँ लौट आयेगा। मथुरा के पढ़े लिखे लोगों मेँ वह स्वयं ऊब जायगा। पढ़ने के लोभ से ही वहाँ अब तक टिका था।'

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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