Saturday, 14 November 2015

unmadini yashoda 73

🔆          [जय गौर हरि]            🔆

▪        [उन्मादिनी यशोदा-73]    ▪

🔅मईया कहती मेरा कन्हैया कितना संकोची,कितना भोला है। उसने तो एक दिन भी मुझे उलाहना नहीँ दिया। दो घड़ी भी मुझसे रुठा नहीँ रहा।

▪'कन्हैया! मुझे पीड़ा होती है। मईया को कुछ भी तो विस्मृत नहीँ होता। उसे तो अपना प्रश्न स्मरण है।'

🔅वह हँसकर उलटे ही पूछता था-'कहाँ होती है मईया?' कितनी बड़ी चिड़िया है पीड़ा? शुक जैसी हरी है या काक जैसी काली?'

▪'अरे, मैँ पूछती हूँ कि तुझे यह चिन्ह दुखता है ?' मईया धीरे से डरती-डरती अपने कन्हैया की उदर रेखा अंगुली से छूती थी।

🔅'यह? यह तो बड़ी अच्छी है।' कन्हैया उस रेखा को छूकर हँसता था। उसे अपने दामोदर होने पर गर्व हो गया था--ऐसी रेखा तो किसी के भी नहीँ है। भद्र, सुबल, तोक के भी नहीँ और दाऊ दादा के भी नहीँ।'

▪मईया चिन्तामग्न हो उठती है और कहती है--'वह अपनी उदर-रेखा देखकर अब भी हँसता होगा?'

🔅अनेक बार कन्हैया मईया से मचलता था-'तू दाऊ दादा के बना दे ऐसी। तोक के बना दे। देवप्रस्थ को बहुत अच्छी लगेगी।'

▪मईया हँस पड़ती थी--'मैं और किसी के क्योँ बनाऊँ ?' दूसरे कोई तेरे जैसे उधमी हैँ ?

🔅मईया के भीतर जैसे बड़वानल भड़क उठता है--'अब कन्हैया को मेरी निष्ठुरता का स्मरण होता होगा। अब मेरे अत्याचार स्मरण करेगा तो ब्रज की ओर मुख भी नहीँ करेगा।'

▪मईया को कितना समझाओ, यह समझ कहाँ पाती है।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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