🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-32] ▪
📬 कल हमने पढ़ा कि "मईया का आग्रह है की दाऊ-कन्हैया में अभी समझ ही कितनी हैं। दोनों धूप में दौड़ते फिरेंगे। कन्हैया का सुकुमार शरीर इतनी विषम वायु-लू कैसे सह सकेगा? अब आगे.....
🔅मईया के बहुत हठ करने पर सेवको को कहना पड़ता है कि मईया श्रीकृष्ण तो मथुरा मेँ हैँ।'
▪मईया उन्माद मेँ बोलने लगती है-'हाय! इस ग्रीष्म मेँ कन्हैया नगर मेँ हैँ!' नगर के लोग कभी नहीँ समझ पाते कि पाषाण के स्फटिक के भवन ग्रीष्म तथा शीत दोनो मेँ कष्टप्रद होते हैँ।
🔅कन्हैया को अब वहाँ कुञ्ज की छाया भी दुर्लभ हो गयी होगी और वहाँ तो रात्रि मेँ भी उष्णवायु चलती होगी।
▪मईया की चिन्ता कब किधर मुड़ पड़े,कुछ ठिकाना नहीँ हैँ-वहाँ देवकी माता सही;किन्तु उन्हेँ क्या पता कि उनका लाल तनिक भी उष्ण वायु नहीँ सहन कर सकता।
🔅मैँ तो उसे रात्रि भर पंखा सेवा करती थी,तनिक भी पंखा शिथिल होता था तो साथ ही कन्हैया जाग पड़ता था।'
▪ उस अग्नियामी ने ब्रज मेँ भले सबके सम्मुख दो-दो बार दावानल का पान किया हो;किन्तु इस प्रेम भूमि मेँ किसी को स्मरण नहीँ कि कन्हैया मेँ कोई ऐश्वर्य भी है।
🔅मईया को स्मरण आता है कि थोड़ा भी उष्ण दूध कन्हैया पी नहीँ पाता था। उसके हाथ मेँ दूध का पात्र न दो तो मानेगा नहीँ और दूध तनिक भी उष्ण हुआ तो पात्र ही गिरा देता था।
▪ मथुरा मेँ कन्हैया को निद्रा कैसे आती होगी?'
🔅मईया अत्यन्त दयनीय होकर ब्रजेश्वर के चरण पकड़ कर कहती है- मैँ कब कहती हूँ देवकी उसकी मईया नहीँ है लेकिन आप दो छकड़े नियुक्त करदो। कन्हैया सांयकाल ब्रज मेँ आ जाया करे। मैँ उसे रात्रिभर पंखा सेवा करुँगी । रात्रि मेँ तो वह सुख से सो सकेगा। प्रात:वह जब मथुरा जाने को कहेगा,मैँ कभी उसे मना नही करुँगी।'
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]
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