Monday, 9 November 2015

unmadini yashoda 10

🔆            [जय गौर हरि]            🔆
▪        [उन्मादिनी यशोदा-10]    ▪

📬 कल हमने आस्वादन किया कि " मईया को सुबह का समय तो कलेऊ की प्रस्तुति में व्यस्त रखता है। सबको यही लगता है की कन्हैया वन में है। अब आगे......

🔅मईया दिन के प्रहर मेँ ही छाक सजाने लगी है। छौके मेँ क्या-क्या रखना है,मईया के अतिरिक्त दूसरे किसी को पता भी हो तो मईया इसे मानेगी नहीँ।

▪दाऊ की तो चिन्ता नहीँ,उसे तो जो मिलेगा,भूख लगने पर भरपेट भोजन कर लेता है किन्तु कन्हैया को तो विशेष विशेष पदार्थोँ की भूख लगती है।

🔅मईया ही अनुमान कर पाती है कि आज उनके कन्हैया को क्या रुचेगा।

▪कन्हैया को जब भूख लगी तो मुख उदास करके बैठ जाता है।

🔅यह पूछने का कोई अर्थ नहीँ है 'कन्हैया को काहे की भूख लगी है?' कन्हैया कभी स्वयं भी नहीँ समझता कि उसे काहे की भूख लगी है।

▪दाऊ या भद्र पूछेँगे रोटी खायेगा?

🔅 माखन और रोटी?' बहुत पूछने पर कन्हैया अपनी घुँघराली अलकोँ से मण्डित मस्तक अस्वीकृति से हिला देगा।कन्हैया की भूख समझने की यही पद्धति हैँ।

▪तब फिर पूछना पड़ेगा-'मोदक खायेगा? बड़े मधुर मोदक हैँ।'

🔅बिना देखे ही 'उहुँ,मोदक बासी हैँ और उनमेँ से तो गन्ध आती है।'

▪कन्हैया को जब मोदक खाने की रुचि नहीँ हैँ,तब मोदक मेँ कुछ न कुछ त्रुटि तो होनि चाहिए। कन्हैया मोदक को खट्टे नहीँ बतलाता,यही क्या कम है?

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणायो समर्पणम्]

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