Saturday, 14 November 2015

unmadini yashoda 59

🔆      [जय गौर हरि]            🔆

▪      [उन्मादिनी यशोदा-59]    ▪

🔅वंशी ब्रज मेँ वर्जित वाद्य बन गयी है। अनेक बालक और गोप वंशी बजाते थे। भले ही बेसुरा ही बजाते थे,इसलिए बजाते थे कि ब्रजेन्द्र-नन्दन उससे वेणुवादन को उत्साहित होते थे।

▪कन्हैया कभी सिखलाने के लिए,कभी सुनाने के लिए,कभी अपनी मौज मेँ वंशी बजाता था। वंशी सदैव बजती ही रहती थी। कन्हैया गया और वंशी मूक हो गयी। वंशी तो ब्रज मेँ ही बजती थी। कन्हैया तो भले चला गया किन्तु वंशी मथुरा नहीँ गयी।

🔅वंशीधर तो कन्हैया ही हैँ। वंशी कोई बजा ले;किन्तु वंशी किसी दूसरे का वाद्य तो नहीँ बनती। चेतन को जड़ और जड़ को चेतन बना देने की क्षमता, सराचर सृष्टि को विमुग्ध बना देने की शक्ति जिस वंशी मेँ है, वह ब्रज से बाहर तो नहीँ जाया करती।

▪मईया अपने लाल की वंशी को प्राणों के समान रखती है और कहती है--'कन्हैया इसे रात्रि मेँ भी साथ लेकर सोता था।' एक क्षण को इसके बिना नहीँ रहता था। कभी कर मेँ,कभी कटि-काछनी मेँ लगाये रहता था।

🔅'कोई दूसरा वंशी को स्पर्श करे,यह मईया को सहन नहीँ हैँ। श्री ब्रजराज तक को वह वंशी छूने नही देती--'महर! इसमेँ क्या विशेषता है यह तो नीलमणि ही जानता है। वह आते ही अपनी वंशी पूछेगा।'

▪मईया अपने आँचल से दिन मेँ कई-कई बार वंशी को पोंछती है और ऐसे कोमल ढंग से पोंछती  है,जैसे कन्हैया का मुख ही पोंछ रही हो। वंशी को देर तक उलट-पलटकर देखती रहती है और ह्रदय से लगाये रहती है। 'कन्हैया कहता था कि गोपियाँ इसे चुरा लेँगी। कोई तो चुराने नहीँ आयी। मैँ इसे किसी को चुराने नहीँ दूँगी।'

🔅मईया को भी पुत्र का रोग लग गया है। वह भी वंशी को छाती से लगाकर ही सोती है। कुछ समय को कहीँ रखती भी है तो घूम-फिरकर बार बार देखने पहुँच जाती है। दूसरे किसी के सम्मुख इसे निकालते मईया का ह्रदय काँपता है।

▪यह वंशी तो इसकी विधि हो गयी है।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]

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