🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-68] ▪
🔅विपरीत परिस्थिति अत्यन्त प्रिय वस्तु को भी अप्रिय बना देती है। माखन जैसी परमप्रिय वस्तु गोप-गोपियों की अब ब्रज मेँ उपेक्षणीय हो गयी है। कोई बालकों को भी माखन नहीँ खिलाना चाहती। सब जानती हैँ कि बालक माखन देखकर रोने लगते हैँ।
▪'कन्हैया के करों से बन्दर बासी नवनीत गटकते थे।' गोपियाँ बन्दरों को देखकर अब माखन के लोँदे फेँकती हैँ उनकी ओर,किन्तु बन्दर तो ऐसे दूर कूदते हैँ जैसे किसी ने पत्थर फेँके हो। सूंघना तो दूर,उलटे दाँत दिखाते हैँ। इन्हें भी अब माखन अप्रिय हो गया।
🔅गोपी मस्तक पर हाथ पटकती बिलखती है--'अब धरे जाओ माखन के मटके या उसे धृत बनाती बैठो।' बहुत प्रिय था तुम्हें माखन। प्राण जैसे लगते थे यह भाण्ड। इनके पीछे तुमने उलाहना दे-देकर उस कन्हैया की नाक मेँ दम कर रखा था। अब वह उबकर चला गया। समेटो अपना नवनीत।'
▪सबकी व्यथा एकसी है। दधि-मन्थन करते,माखन निकालते हाथ ही नहीँ, ह्रदय झुलसते हैँ। एक वह क्या चला गया,ब्रज का जीवन चला गया।
🔅अब ब्रज मेँ-गायों से भरे ब्रज मेँ, गोपों के ब्रज मेँ ही गोरस अखाद्य हो गया है। दूध, दही, माखन देखकर लगता है कि ह्रदय बाहर आ जायगा।
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪
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