Monday, 9 November 2015

unmadini yashoda 47

🔆      [जय गौर हरि]           🔆

▪      [उन्मादिनी यशोदा-47]    ▪

📬 कल हमने पढ़ा कि "मईया कहती है कन्हैया इस पुलिन घरोंदे बनाया करता था और मैं उसका हाथ पकड़ कर ले जाया करती थी। लेकिन अब मईया का हाथ पकड़कर कोई इसे इस पुलिन से घर ले जाये, यह कितनी विडम्बना है।" अब आगे ....

🔅गोपी का स्वयं का मन भी तो यही पुकार रहा है की-मुझे यही पड़ी रहने दे। यही इसी रेणुका मेँ मुझे दब जाने दे' और इसी रेणुका मेँ शरीर की समाधि बन जा सकती है।

▪गोपी-मईया का हाथ पकड़कर आग्रह करती है-अब आप उठिए ,रेणुका तप्त होने लगी है। आपका कन्हैया जब आयेगा और यदि भवन मेँ आपको न पा सके तो यहाँ रेणुका से उनसे भी उठा नहीँ जा सकेगा।'

🔅मईया कहती है-'कन्हैया आयेगा और अवश्य ही आयेगा।'

▪ब्रजेश्वर भी यही कहते है। वह तो कभी असत्य नहीँ कहते। मईया हड़बड़ा कर उठती है। मेरा लाल आ रहा होगा और भूखा आयेगा।' उन्हेँ लगता है कि उनका कन्हैया घर आकर उनकी प्रतीक्षा कर रहा होगा।

🔅मईया गोपिका से पूछती है-'तू क्या देखती है?' मुझे तो कन्हैया का एक भी पदचिन्ह यहाँ नहीँ दीखा।'

▪गोपिका क्या कहे? वह पता नहीँ,किस आशा मेँ बार-बार घूमकर पुलिन की ओर देखती है। काश!-पुलिन पर पड़े उनके पदचिन्ह वायु कहीँ रहने देती। एक भी पदचिन्ह यहाँ बचा होता।

🔅मईया भी तो बार-बार घूमकर पुलिन की ओर देखने लगती है। आशा की छलना ।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]

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