Monday, 9 November 2015

unmadini yashoda 36

🔆          [जय गौर हरि]          🔆

▪       [उन्मादिनी यशोदा-36]    ▪

📬 कुछ दिन पहले हमने पढ़ा कि "मईया को स्मरण ही नहीं रहता कि कन्हैया भवन में नही हैं। वह तो कन्हैया को एक कक्ष से दूसरे कक्ष में ढूंढने लगती है। तब सभी सेविकाएं दुखी हृदय से मईया को स्मरण कराती है कन्हैया तो मथुरा में हैं। अब आगे.......

🔅वर्षा मेँ,गर्मी मेँ,शीतकाल मेँ,कभी भी आँधी आ सकती है। वैसे तो आँधी का प्रधान समय गर्मी और वर्षा है;लेकिन वायु का वेग बढ़ते ही जिसे आँधी का भ्रम होता हो,उसके लिए तो सब ऋतुएँ आँधी की है।

▪मईया को तो तनिक वायु तीव्र होते ही आँधी का भ्रम होने लगता है। काली,पीली या लाल धूलि से आकाश को ढक देने वाली आँधियां कम ही आती है और जब आती है तो मईया 'तृणावत्-तृणावत्' करती भागती फिरती है।

▪मईया चीखती हुई कहती है-'आ गया-आ गया मेरे कन्हैया को उड़ा ले जाने वाला राक्षस। सब तरफ के द्वार बन्द कर दो।'

🔅मईया कभी कोई तकिया कभी कोई तकिया दुबकाते फिरती हैँ यां एक कक्ष से दूसरे कक्ष की तरफ दौड़ती है। 'कन्हैया कहाँ है?

▪मईया की आशंका को सर्वथा निराधार नही कहाँ जा सकता।

🔅मईया सेवको से कहती है  'कन्हैया गोष्ठ मेँ चला गया लगता है तुम सब वन मेँ भागकर जाओ। आँधी आ रही है। दाऊ-कन्हैया कच्चे-पक्के फल समेटने वृक्षों के नीचे दौड़ेँगे। उन्हेँ चोट लग सकती है। उन्हेँ भवन मेँ ले आओ।

▪कन्हैया जब ब्रज मेँ था तो आँधी आने पर गोप भी सशंक हो उठते थे।

🔅कन्हैया तो अत्यन्त सुकुमार है वह तो एक जामुन के गिरने का आघात भी सह नहीँ सकता। गोप-बालक उसे ऐसे समय मेँ वृक्ष के नीचे नही जाने देते थे क्योकी आँधी मेँ फल ही गिरेँगे, कोई शाखा टूटकर नहीँ गिरेगी यां वृक्ष नहीँ गिरेगा इसका तो कोई आश्वासन नहीँ है।

▪अत: मईया का आशंकित होना ठीक ही तो है उन्हेँ तो यही लगता है कि उनका कन्हैया वन मेँ है।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]

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