🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-58] ▪
🔅मईया को कैसे विश्वास हो कि कन्हैया को देखे बिना गोप-कुमारों में यह उत्साह आया है।'
▪'कन्हैया किसी दूसरी टोली के साथ तो नहीं है?' लेकिन गोप-कुमारों का उत्साह भी कहाँ टिके रहने वाला है। प्रात:काल जब कन्हैया नहीं मिलता,सब एक साथ नन्दभवन पहुँचते हैं अपने सखा को पुकारते और वहाँ भ्रम-भंग होता है--'वह तो ब्रज में ही नहीं है।
🔅ब्रज की होली परस्पर भस्म,धूलि,गोबर उछालने,मलने की उद्यम क्रीड़ा और फिर रंगभरी झोलियाँ लिए बरसाने की यात्रा करने वाली होती थी-अब तो यह सब स्वप्न हो गया। जब रसराज ही ब्रज में नहीं रहा तो रंग-क्रीड़ा में रस रह सकता है? सर्वत्र मानो तो नन्दगाँव और बरसाना आज विषाद का साम्राज्य छा जाता है। सब बालक,बालिकाएँ मुख छिपाते एकान्त कोना ढूँढ़ते हैं और रुदन करते रहते हैं।
▪मईया को तो प्रत्येक बालक अपना कन्हैया ही लगता है और एक-एक को पूछती है। एक-एक को बुलाने सेवक भेजती है। मईया आञ्चल से बालक का मुख पोंछती हुई कहती है-'मेरे लाल! आज के दिन रोते नही। उपवास नहीं करते। कुछ मधुर पदार्थ मुख में देती है--'कन्हैया आयेगा और तुझे दुखी देखेगा तो उदास हो जायेगा।
▪आज तो बरसाने के बालकों को भी बुलाना है। बालिकाएँ भी मईया की पद-वन्दना करने आती हैं। कीर्तिकुमारी की पद-वन्दना भी उनकी कोई अन्तरंगा सहेली ही करेगी। मईया मूर्ति की भाँति ठिठक जाती है--'आज वह होता!'
🔅लेकिन मईया को तो आज रुदन करने का भी अवकाश नहीं है। आज यह बालिकाएँ सब लोक-लाज त्यागकर स्वयं उसकी पदवन्दना करने आईं हैं। कन्हैया होता तो यह ऐसे स्वयं चलकर आतीं क्या इस घर में ? इन्हें कन्हैया ले आता'""।
▪मईया एक-एक को अंक में लेती है। अपने हाथों से वेणी गूँथती,आभरण सजाती है।
🔅मईया निर्णय नहीं कर पाती कि वृषभानुनन्दिनी के लिए क्या भेजे? क्या दे? जो भी उठाती है,कुछ सोचकर छोड़ देती है--'इस घर का कोई उपहार उसे अब सुखी करेगा? उपहारसे उसकी व्यथा बढ़ेगी ही।
▪मईया चाह करने पर भी अपने को रोक नहीं पाती-'मैं भाग्यहीना उस जैसी लक्ष्मी को गोद में बैठाने योग्य नहीं हूँ। विधाता ने मुझे इस सौभाग्य के योग्य नहीँ माना।' वृषभानुदुलारी को मेरा लाख-लाख आशीर्वाद!'
🔅होली का रंगभरा पर्व;किन्तु ब्रज में तो यह विषाद का विषम दिवस बन गया है। केवल मईया दूसरे दिनों की अपेक्षा इस दिन कुछ अधिक सचेत रहती है। अत्यन्त कातर बालकों बालिकाओं को आज इसी का वात्सल्य स्नेहदान करता है।
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]
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