🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-15] ▪
📬 कल हमने आस्वादन किया कि "मईया अपने आँचल से भद्र का मुख पोंछती और कहती चल, हाथ मुंह धोकर कुछ खा ले। मईया को तो दो क्षण के लिए कन्हैया भूल गया। अब आगे......
🔅गायों की हुँकृति सुनायी पड़ने लगी है।
▪भद्र को ही नहीँ,मईया को भी लगता है कि उनके दाऊ-कन्हैया गोष्ठ मेँ आ गये होंगे।
🔅गायेँ पुकारेँ और कन्हैया ना आये,ऐसा नहीँ हो सकता।कन्हैया कहीँ भी खेल मेँ लगा हो गायों के पुकारने पर अवश्य दौड़ आता है।
▪अब गोदोहन के समय तो सब बालक अपने गोष्ठों मेँ चले जायगेँ।
🔅'भद्र ने कहा मईया दाऊ -कन्हैया की दोहनी भी मैँ ले जाऊँगा।'
▪मईया ने कहा 'तू चल,मैँ दोहनियां भेज रही हूँ।'
🔅मईया भद्र को दोहनियां नहीँ देना चाहती बालक है,कही भी गिरा देगा;लेकिन भद्र तो मानने से रहा। इसलिए मईया को देनी ही पड़ेँगी।
▪भद्र दोहनियाँ लेकर गोष्ठ मेँ जाता और प्रतिदिन यह दोहनियाँ फोड़ देता है।
🔅क्या करे? भद्र तो उत्साह से दौड़ा जाता और कहता 'दाऊ! कन्हैया! मैँ तुम दोनों की भी दोहनियाँ ले आया हूँ।
▪इस प्रकार जब कोई उत्तर नहीँ मिलता,तो भद्र के हाथ से दोहनियाँ छूटकर गिरेँगी नहीँ क्या ?
🔅नन्दबाबा प्राय: दौड़कर भद्र को सम्भालते हैँ और स्वयं भी उसे गोद मेँ लेकर रुदन करने लगते हैँ।
▪गायेँ हुँकार करती है।बछड़े-बछड़ियाँ माताओँ के थनों से मुख लगाना नहीँ चाहते।गायों को भी किसी प्रकार गोदोहन सम्पन्न करना पड़ता है।
🔅मईया तो इसी प्रतीक्षा मेँ व्याकुल रहती है-'अब तक मेरे दाऊ-कन्हैया गोदोहन करके भी भीतर नहीँ आये?"
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]
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