🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-70] ▪
🔅मईया सूने नेत्रों से गोपियों की ओर देखती है--'मेरा लाल भोला था-बहुत भोला। अब क्या उसे वह सब स्मरण रहता होगा? वह वैसा ही भोला है। उसे तो चाहे जितना मैँने दुख दिया,उसी प्रहर सब भूल जाता था; किन्तु मैं पिशाचिनी हूँ अपने ही बालक को दौड़ाने-डाँटने, रुलाने पर उतरी ही रहती थी।'
▪'अब इस माखन का क्या होगा?' मईया उठने मेँ, हिलने मेँ भी असमर्थ हो जाती है। वह एकटक घूरे जाती है और बड़बड़ाती है--'इसी माखन के लिए मैँ कृपण हो गयी थी। अब ब्रज के सब घरों का माखन लाकर मुझे उसी मेँ दबाकर चिता पर चढ़ा दो। जला दो इसी के साथ मुझे। मुझ पापिनी की प्यास मिटा दो।
🔅मईया अनेक बार उन्माद मेँ अट्टहास करने लगती है। गोपियों के प्राण सूखने लगते हैँ। सेविकाएँ ब्रजेश्वर को बुलाने दौड़ती हैँ।
▪गोपी की वेदना भी मईया से कम नहीँ है--'वह भुवनमोहन अपनी नन्हीं लाल हथेली फैलाये मचलते थे--माखन दे!' और मैँने तनिक-तनिक माखन के लिए उन्हेँ खिझाया, ललचाया, नचाया। उनके उस नन्हें हाथ पर सरसो जितना माखन रखते मुझे लज्जा नहीँ आती थी। वह गृह उनका नही था? वह सब माखन उन्हीँ का नहीँ था? उन्होँने जो मान दिया था,उससे मतवाली हो गयी थी मैँ।'
🔅मईया के सम्मुख कोई यह सब कहने का साहस नहीँ कर सकती किन्तु माखन देखते ही किसी का भी ह्रदय तो हाथ मेँ नहीँ रह जाता। गोपी के घर मेँ से माखन को कैसे अदृश्य किया जाय? ब्रजेश्वरी के सम्मुख ही माखन न पड़े, यह व्यवस्था कैसे बने?
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪
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