Saturday, 14 November 2015

unmadini yashoda 54

🔆         [जय गौर हरि]            🔆

▪      [उन्मादिनी यशोदा-54]    ▪

📬 कल हमने पढ़ा कि "मईया आप चढ़ावे तो गिरिराज प्रकट हो जायेंगे। गोपियों के अनुरोध में सत्य नही है, यह कहने का साहस किसी में नही हैं ? लेकिन मईया तो उठने का साहस ही अपने में नही पाती। अब आगे...

🔅मईया रुदन करते हुए अपने हाथों की ओर देखकर कहती है-'इन करों से कुछ मुख में लेने कन्हैया ही नहीं आया तो कोई देवता इस हतभागिनी के भाग्य दग्ध करों से अर्पित पदार्थ कैसे लेँगे।

▪मईया की व्याकुलता बढ़ती जाती है। उन्हेँ लगता है कि गिरिराज गोवर्धन के शिखर पर विशाल देह गिरिराज तो प्रकट हुए नहीँ:किन्तु उनका कन्हैया आ बैठा है।

🔅मईया दौड़ती है--'आ गया--मेरा कन्हैया आ गया।' वह मूर्ति अदृश्य होती है तो मईया मूर्छित  होकर गिर पड़ती है। चेतन होते ही ढेरों पदार्थ एक साथ अर्पण करने के लिए उठाती है।

▪गोपों ने,गोपियों ने,बालक-बालिकाओं ने भी अब एक नियम बना लिया है। कन्हैया ने जब गोवर्धन-पूजन कराया था,तब सबने पूजन के बाद प्रसाद-भोजन किया था उसके पश्चात सब गोपियाँ,बालक,बालिकाएँ छकड़ों पर बैठकर परिक्रमा करने निकली थीं। लेकिन अब सब पैदल,नंगे पैर परिक्रमा करते हैँ। सब को आशा रहती है कि कदाचित सांयकाल तक कन्हैया आ जाये। कोई भी पहले प्रसाद ग्रहण नहीँ करना चाहता।

🔅कल सांयकाल से उपोषित,सात कोस की परिक्रमा से शान्त लोग लौटते हैँ:किन्तु किसी मेँ प्रसाद ग्रहण का उत्साह नहीँ। प्रसाद का सम्मान करना चाहिए,इसलिए मुख मेँ कुछ डाल लेते है।

▪मईया आँचल फैलाकर गिरिराज से माँगती है-'कन्हैया सदैव प्रसन्न रहे!' सब हाथ फैलाकर कातर स्वर से एकमात्र यही याचना करते है।

🔅किसी एक ने बहुत सामान्य ढंग से लौटते समय यह बात कही-'अब यदि इन्द्र रुष्ट हो जायँ ? अब यदि फिर वैसी ही वर्षा होने लगे?'

▪मईया ने सुना और उसका सतेज स्वर सुनकर कहती है'--'इन्द्र कल रुठता हो तो अभी रुठ जाए लेकिन अब मैँ अपने लाल को पर्वत नहीँ उठाने दूँगी।'

🔅गोपी कहती है-'हमारा कन्हैया मथुरा मेँ सुरक्षित है।' अब ब्रज मेँ डूबने-बहने की किसे चिन्ता है। इन्द्र वर्षा करता क्यों नहीँ?अब किसका डर है उसे ? अब कहाँ हमारा कन्हैया यहाँ गिरधरन करने बैठा है।'

▪'इन्द्र वर्षा करे या वज्र मारे,ब्रज मेँ अब कोई उसकी पूजा-प्रार्थना नहीँ करेगा। गोपों के स्वर मेँ रोष है और जो गायों को वर्षा करके नष्ट करना चाहता था,ब्रज मेँ उसके प्रति श्रद्धा सम्मान कैसे रह सकता है।'

🔅'सुखी रहे हमारा कन्हैया!' सबका एक स्वयं;किन्तु मईया निढाल हो रही है छकड़े में--'कन्हैया आज भी नहीं आया!'

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]

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