🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-53] ▪
🔅वैदिक इन्द्रयाग को सत्य संकल्प कन्हैया ने गोवर्धन-पूजन मेँ परिवर्तित कर दिया। देवराज इन्द्र का सब गर्व, आक्रोश उस गिरिधारी के सम्मुख गलित हो गया। अब तो सुरपति स्वपन मेँ भी ब्रज मेँ किसी से पूजा पाने की आशा नहीँ कर सकते।
▪ब्रज मेँ गोवर्धन-पूजन का विधान स्वयं ठाकुर जी ने किया था। अत: गोप प्रतिवर्ष गिरिराज गोवर्धन का पूजन करते है। कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को यह पूजन और परिक्रमा तो होती ही है।
🔅मईया बड़े उत्साह मेँ स्वयं पूरी रात नाना प्रकार के पकवान बनाती रहती है।'कल कन्हैया अवश्य आयेगा।' कल उसके देवता का पूजन है और पूजन करने के लिए तो आयेगा ही।
▪मईया को ही नहीँ पूरे ब्रज को यही आशा है। कन्हैया ने ही तो कहा था गिरिराज गोवर्धन ब्रज के देवता है। ऐसे देवता जिन्होँने प्रत्यक्ष भोग लगाया और प्रलय-वर्षा से ब्रज को बचाया। बहुत विशाल होने पर चतुर्भुज होने पर भी कन्हैया की दूसरी मूर्ति ही लगते हैँ। अब कल उनका पूजन है तो उसमेँ सम्मिलित होने कन्हैया को दाऊ के साथ आना ही चाहिये।
🔅ब्रज मेँ दीपमालिका जलती है;किन्तु उत्साह गोवर्धन पूजन मेँ आता है। ब्रज की लक्ष्मी तो गायेँ हैँ और उनका पूजन भी गोवर्धन पूजा के साथ होता है। इस दिन छकड़े जुड़ते है, गोपियाँ श्रृंगार करती हैँ, गायों का, ब्राह्माणों का और गिरिराज का भी पूजन होता है। यज्ञ होता है-सब कुछ होता है; किन्तु एक आतुर प्रतीक्षा के साथ होता है। बार बार सबकी दृष्टि मथुरा के पथ की ओर जाती है।
▪मईया बार-बार पूछती है-'कोई रथ आ रहा है?' मईया एक-टक गोवर्धन की ओर देखती रहती है और कहती है-कन्हैया आ जाता तो गिरिराज प्रत्यक्ष होकर नैवेद्य स्वीकार करले।' इनको भी उसी के करों का नैवेद्य ही प्रिय है।'
🔅'मईया आप नैवेद्य चढ़ावेँ तो गिरिराज प्रकट हो जायेँगे।' गोपियों के अनुरोध मेँ सत्य नहीँ है, यह कहने का साहस किसी मेँ है? लेकिन मईया तो उठने का साहस ही अपने मेँ नहीँ पाती।
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]
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