Monday, 9 November 2015

unmadini yashoda 12

🔆            [जय गौर हरि]            🔆
▪        [उन्मादिनी यशोदा-12]      ▪

📬 कल हमने आस्वादन किया कि "मईया दिन के प्रथम पहर से ही छाक भेजना प्रारम्भ कर देती है। दाऊ और  कन्हैया पता नही किधर गायेँ ले गए होंगे। सब दिशाओं में अलग अलग छाक जानी चाहिये। अब आगे......

🔅 मईया को एक बार छाक भेजकर सन्तोष नहीँ होता। वह तो एक छाक भेजकर फिर छीँके भरने लगती है--'कन्हैया-दाऊ तो वन मे उछलते-कूदते,खेलते है तो उन्हेँ भूख भी शीघ्र लग जाती है।'

▪मईया का तो कहना ठीक है-'कन्हैया छाक देखकर प्रसन्न हो जायेगा और झट से छीँके खोल लेगा

🔅कन्हैया को तो भूख का पता कहाँ लगता है वह तो सखाओँ को बंदरों को बाँटने-खिलाने के उत्साह मेँ तनिक कुछ अपने भी मुख मेँ डाल लेता है।

▪मईया के दाऊ-कन्हैया ही तो नहीँ हैँ। सब बालक तो मईया के अपने ही है।

🔅मईया कहती है-'नन्हा तोक,तेजस्वी,देवप्रस्थ भी बहुत छोटे हैँ उन्हेँ भी काफी देर तक भूखे नहीँ रहना चाहिये।

▪दिन के प्रथम प्रहर से तृतीय प्रहर के अन्त तक मईया को छाक भेजने की धुन रहती है और मानती भी तब है जब कोई कह देता है--अब तो बालक लौटने के लिए गायेँ घेरने लग गये होंगे।'

🔅मईया का तो पूरा दिन छाक सजाने-भेजने मेँ लग जाता है।

▪कोई नहीँ कहेगा कि वन मेँ दाऊ-कन्हैया नहीँ हैँ,छाक जायेगी तो बालक हैँ, कपि हैँ और कोई ना भी हो तो भी तो उसे लौटा लाकर मईया को दुखित करने का भूल तो कोई कर नहीँ सकता।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणायो समर्पणम्]

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