🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-14] ▪
📬 कल हमने आस्वादन किया कि " मईया तो पुकारती ही जाती है 'दाऊ, कन्हैया, बेटा भद्र ! कहाँ हो तुम सब ? भद्र को भी अब पहले के समान वन से सीधे नंदगोष्ठ मईया के सन्मुख जाते संकोच होता है। अब आगे......
🔅'भद्र'(कान्हा का सखा)को तो कभी नन्दगोष्ठ के अतिरिक्त दूसरा गोष्ठ अपना नहीँ लगता, वह तो मईया के सामने आने से बचने के लिय अब अपने छोटे भाई 'तोक'(भद्र का छोटा भाई और कान्हा का सखा)के साथ गायों को लेकर अपने ही गोष्ठ जाता है।
▪'भद्र! बेटा भद्रसेन !
🔅मईया को प्राय: भद्र अकेला आता मिल जाता है और आते ही मईया के गोद से रोते-रोते लिपट जाता है।
▪मईया कहती है-क्या हुआ भद्र? तुम रो क्यों रहे हो?'
🔅मईया ने कहाँ किसी बालक को कभी पराया माना।मईया भद्र मेँ व्यस्त हो जाती है-'बेटा भद्र तुम्हेँ किसी ने कुछ कहा है? कन्हैया ने खिझाया है?दाऊ ने साथ नहीँ खेलने दिया?तुम्हेँ हुआ क्या है और दाऊ-कन्हैया कहाँ है?'
▪मईया तो बहुत से प्रश्न पूछ रही हैँ।
🔅भद्र भी क्या कहे ओर कैसे कहे? वह तो स्वयं नहीँ समझ पाता कि दाऊ और कन्हैया कहाँ हैँ?
🔅भद्र को भी ऐसा लगता नहीँ की दाऊ और कन्हैया साथ नहीँ आये।उसे तो रुदन के अतिरिक्त कुछ सूझता नहीँ।
🔅'तुम्हारी मईया ने कुछ कहा? बाबा ने तुम्हेँ डाँटा है?'
▪मईया अपने आंचल से भद्र का मुख पोंछती और कहती चल,हाथ मुँह धो।कुछ खा ले।'
🔅मईया को कन्हैया दो क्षण के लिए भूल गया।भद्र रो रहा है उसे चुप करवाकर कुछ खिलाना है।
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]
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