🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-18] ▪
📬 कल हमनें आस्वादन किया कि "मईया सब सखाओं को अपने गोद में लेकर शैया पर थपकी देकर सुलाने का यत्न करती है। 'कन्हैया कल आएगा'। इसी शक को दुहराती हुई मईया की पलकें बन्द हो जाती हैं। अब आगे....
🔅मईया को तो कुछ क्षण के लिए लगता है कि कन्हैया उनकी गोद मेँ सो रहा है।वह तो भूल ही जाती है कि उनकी गोद मेँ कन्हैया नही कोई सखा सो रहा है।
▪मईया कभी टटोलती है,थपकी देती हैँ और कभी लोरी गाने लगती है।कभी सोचती है 'यह इतना बड़ा हो गया!'
🔅 मईया बार बार चौँकती हुई सोचती है,उनका कन्हैया नन्हा शिशु है।अभी कुछ ही महीनोँ का तो है और कभी सोचती है कि कन्हैया अब शिशु नहीँ है,कुछ बड़ा हो गया है।
▪मईया इसी उलझन मेँ कुछ क्षण तन्द्रा ले लेती है और इसी तन्द्रा को मईया की निद्रा मानना पड़ेगा।
🔅यह तन्द्रा ही मईया को शान्त-शिथिल रहने मेँ अधिक सावधान रखती है।
▪मईया को यही भय लगा रहता है कि अधिक हिलने डोलने से उनका कन्हैया जाग जायेगा इसलिये हल्के हाथों से थपकियाँ देने लगती है और लोरी गाने लगती है।
🔅रात्रि मेँ मईया अनेक बार चौँकती है और मन ही मन हँसती हैँ कि मैँ भी कितनी पगली हूँ कन्हैया सदा शिशु ही तो नहीँ रहेगा न।अब अपने बाबा के पास सोने योग्य हो गया है;लेकिन मईया के स्नेह के कारण महर के समीप शयन करने नहीँ जा पाता।'
▪तन्द्रा इस भाव को अधिक आल्हाद भरा बना देती हैँ।
🔅निन्द्रा-तन्द्रा के यह क्षण ही मईया के सबसे आनन्द भरे क्षण हो गये हैँ अब।
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]
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