🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-62] ▪
🔅पहले भी मयूर नन्दभवन पर ही अधिक बैठते थे। अब तो कोई भूला-भटका ही रात्रि मेँ दूसरे किसी के भवन पर बैठता है। जो मयूर भटककर अन्यत्र बैठ जाए तो लड़कियों को उसी के पिच्छ मिल सकते हैं।अत: उन सबको बहुत दौड़ना,भटकना पड़ता है। वर्ह-पिच्छ कभी कभी ही प्राप्त होता है। नन्दभवन तो वह सुबह-सुबह कैसे जा सकती हैं।
▪कोई दासी यह नहीँ चाहती कि मईया सुबह ही मस्तक पर हाथ धरकर बैठ जाय और रुदन करते कहने लगे--'मैँ इन मयूरपिच्छ का क्या करुँ? इनके द्वारा किसके केश सजाऊँ? इसलिए दासियाँ अँधेरे में ही उठकर पहिले मयूरपिच्छ समेटती हैं और प्रयत्न करती हैँ कि कोई पंख मईया की दृष्टि मेँ न आये।
🔅दासियाँ दुखी होती है और कहती हैं कि मयूरों को कैसे समझावें कि कन्हैया अब इस सदन मेँ नहीँ हैँ। यह अन्तत: अबोध पक्षी ही हैँ।सुबह सबके सब आँगन मेँ उतर आते हैँ और अपनी केका-ध्वनि मेँ पुकारने लगते हैँ। जैसे मयूरमुकुटी को बुलाते हैँ। मईया भी इन्हें मुट्ठी भर-भरकर दाने डाले बिना मानती नहीँ और कहती है-'यह मेरे कन्हैया के सखा हैँ। वह इनके साथ नूपुर की रुनझुन करता नाचता रहता था।'
▪मयूर हैँ कि दाने चुगना इन्हें सुहाता नहीँ और मईया के ही आसपास घूमते रहते। अनेकों बार मईया के वस्त्र पकड़कर चोँच से खीँचेते हैं। इनको कोई कैसे समझाये? आँगन मेँ कक्ष मेँ मईया के समीप पंख गिरा देते हैँ और फिर मईया के वस्त्र खीँचकर मानो संकेत करते हैं-'यह पिच्छ आपके पुत्र के लिए।'
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪
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