Saturday, 14 November 2015

unmadini yashoda 76

🔆           [जय गौर हरि]            🔆

▪       [उन्मादिनी यशोदा-76]    ▪

🔅मईया दोनो हाथों से ऊखल को दबाती है। मूर्छित भी हो जाय तो सबकी कुछ चिन्ता मिटे। तब तो सब इसे उठाकर शय्या पर सुला देँगी। उपचार करेँगी और ऊखल को किसी कक्ष मेँ छिपा देँगी; किन्तु मईया की मानसिक पीड़ा की ज्वाला इतनी प्रबल है कि मूर्छा भी उससे दूर भागती है।

▪मईया जब चाहे विक्षिप्त हो उठती है--'इतने भारी ऊखल को वह घसीटता रहा। तुम सब मुझ पर थूको। मुझ पिशाचनी की अवहेलना करो। कोई मुझे स्पर्श मत करो। मैँ सबसे तिरस्कार पाने योग्य हूँ। सब मुझसे मेरी छाया से दूर हट जाओ। मैँने हत्यारिणी के समान अपने कुसुम-कोमल कन्हैया को इस ऊखल से बाँध दिया था।'

🔅गोपियाँ मईया का मन दूसरी ओर ले जाने का प्रयत्न करती हैँ--'वह प्रसन्न नहीँ हुआ था? वह स्वयं नहीँ इस ऊखल से टिककर खड़े होता था और कहता नहीँ था कि 'मईया! बाँध दे।'

▪मईया का मन कभी कभी दूसरी ओर जाता है--'वह तो झगड़ता था कि दाऊ दादा को बाँध,भद्र को बाँध,तोक को बाँध, सबको एक साथ बाँध दे। तू बाँध तो सही।'

🔅मईया निढाल हो जाती है--'मैँ बाँधने वाली ही तो हूँ। छोड़ना तो महर को आता है।'

▪अब इससे कौन कहे कि सबको छोड़ने-बाँधने वाले उस चिरचपल को बाँधने मेँ दूसरा कोई समर्थ नहीँ है।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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