🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-71] ▪
🔅बन्धु-बाँधव,बन्धन यह शब्द एक ही धातु से बनते हैँ। जो अपने साथ स्नेह-बाँध रहे, वह बान्धव या बन्धु; किन्तु बाँधेगा रज्जु मेँ ही भले ही वह स्नेह की रज्जु हो। ब्रज मेँ मईया ने रज्जु मेँ बाँधकर कन्हैया को दामोदर बना दिया। कितना भी महत्वपूर्ण रहा हो यह बन्धन,इसने कितनी भी महिमा प्रकट की हो मईया के वात्सल्य एवं कन्हैया की स्वजन-वश्यता हो; किन्तु बहुत दुखद हो गया है यह बन्धन मईया के लिए अब।
▪कोई रज्जु मईया की दृष्टि मेँ ही न पड़े यह कैसे सम्भव है?
गोपराज के गृह से दधि-मन्थन की रज्जु कहाँ हटा दी जायँ?
🔅सेविकाएँ प्रत्यन करती रहती हैँ कि मईया की दृष्टि रज्जु पर न पड़े; किन्तु हर समय यह सम्भव नहीँ होता।
▪मईया रज्जू देखते ही उन्मादावेश मेँ आ जाती है। 'कभी वह रज्जू को उठाकर अग्नि मेँ डाल देती, कभी छुरिका लेकर उसके टुकड़े-टुकड़े करती और कभी अपनी भुजा अथवा हाथ मेँ इतने जोर से लपेटने लगती कि सेविकाओं के रोकते-रोकते भी शरीर का वह भाग नीला पड़ जाता। कई दिनों तक नीला रहता। वह पीड़ा नहीँ देता होगा? लेकिन मईया उस पर किसी सेविका को तेल अथवा नवनीत नहीँ लगाने देती।
🔅श्री ब्रजराज के नेत्र भर आते है--'महर! यह तुम क्या कर लेती हो?' मईया के स्वर्णगौर सुकुमार कर या भुजा पर रज्जु कसने का वह नीला चिन्ह--भय लगता है कि स्पर्श करने से पीड़ा होगी--'यदि आज ही कन्हैया आ जाय, कितनी पीड़ा होगी उसे तुम्हारे अंग पर यह चिन्ह देखकर?'
▪मईया तत्काल उस अंग को वस्त्र मेँ छिपा कर कहती है--'मै उससे इसे छिपाये रहूँगी।'
🔅अपराधिनी के समान कहती--'महर! तुम्हारे पैर पड़ती हूँ,उससे मत कहना। मैँ फिर ऐसा नहीँ करुँगी।
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪
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