🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-78] ▪
🔅सम्वाद तो यह भी मईया तक पहुँच ही गया की कन्हैया ने कुब्जा से मैत्री करली है।
▪मईया उस दिन वियोग-व्यथा भूलकर खुलकर हँसी--'अभी उसे कछनी तो बाँधनी आती नहीँ। लेकिन यहाँ भी गोपियो के घट फोड़ देता था। कूबड़ी को चिढ़ाने मेँ उसे आनन्द आता होगा।'
🔅प्रत्येक सम्वाद का मईया अपने ढंग का अर्थ कर लेती है। लेकिन सम्वाद तो विकट आने लगे--'मथुरा पर जरासन्ध ने चढ़ाई करदी है। वह तेइस अक्षौहिणी सेना ले आया है।'
▪मईया नहीँ समझती कि अक्षौणी क्या होता है;किन्तु सुनती है--'उतनी सेना जितनी पूरे ब्रज मेँ गायेँ भी नहीँ हैँ,तो सिर पकड़कर बैठ जाती है।
🔅'दाऊ-कन्हैया ने सब सेना मार दी। अकेला जरासन्ध हारकर भाग गया। यह समाचार शीघ्र न आ गया होता तो मईया के प्राण वैसे ही निकल जाते।
▪'मथुरा के चारो ओर से रक्त की दलदल हो गई है। मुर्दे गिरिराज गोवर्धन से ऊँचे चारो ओर बिछे पड़े है। यह समाचार भी आया तो मईया को धुन चढ़ गयी--'मेरे कन्हैया को वहाँ से कैसे भी निकाल लाओ। निकाल लाओ दाऊ को,रोहिणी जीजी को।जो आ सकेँ,सबको ले आओ।' वे शव सड़ेँगे तो वहाँ बहुत दुर्गन्ध फैलेगी। उसमेँ कन्हैया कैसे रहेगा?
🔅मईया को समझाया नहीँ जा सकता कि इस समय मथुरा के लोगों के आधार ही कन्हैया हैँ।
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪
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