🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-28] ▪
📬 कल हमने पढ़ा कि "मईया अजया बालिका को हृदय से लगाकर कहती है कन्हैया मेरी इस बेटी के विवाह में भाई का स्थान लेने आगे नही आ सकेगा। तब अजया कहती है तो क्या हुआ कन्हैया भईया मेरे विवाह में नही होंगे लेकिन भाई दूज को मेरे हाथों से मोदक खाने अवश्य ही आयेंगे।
🔅'बरसाने की बालिकाएँ मईया से कहती है,कि हम सब तो आपकी सेविकाएँ हैँ।मईया के चरण पकड़ कर कहती हैं हम आपके इन चरणो की सेवा का सौभाग्य नहीँ छोड़ेँगी।अब हम किसके सहारे आपके बुलाने की प्रतीक्षा मेँ बैठी रहेँगी।
▪आप हमेँ बुलायेँ-न बुलायेँ,हम आपके इसी गृह की दासियाँ हैँ;किन्तु हमसे श्री लाडली जी की व्यथा सही नहीँ जाती।
🔅मईया के यह सोचकर नेत्र अखण्डधारावृष्टि करते है-सखि कीर्तिदा ने वचन दिया था की उनकी लक्ष्मी सी कन्या इस भवन मेँ वधू बनकर आयेगी।
▪कितनी-कितनी बहुएँ लाने की उमंग थी मेरे मन मेँ लेकिन भाग्यहीना के मनोरथ दैव (भगवान) से देखे नहीँ गये।'
🔅बालिकाएँ बरसाने की चर्चा सुनाती हैँ-वृषभानु बाबा और कीर्ति मईया भी अनेक बार कहते हैँ,ब्रजेश्वर बुलाने की स्थिति मेँ नहीँ हैँ और हमारी लाडली की स्थिति ऐसी हो रही है कि उसे तो पल भर के लिए भी नेत्रो से दूर नहीँ किया जा सकता।
▪नन्दग्राम और बरसाने की बालिकाएँ बार बार मईया से अनुरोध करती है कि आप लाडली जू को बुला लो!'
🔅मईया के नेत्र फटे-फटे हो उठते हैँ-'मैँ किस मुख से बुलाऊँ?' वह सुमन कोमल बालिका यहाँ तो खुलकर रुदन भी नहीँ कर सकेगी। मैँ क्या कहूँगी उसे? कौन सा सुख रह गया है मेरी इस जली गोद मेँ जिसे देने को मैँ उस भोली बच्ची को यहाँ बुलाऊँ?
▪मईया कहती है मेरा लोभ असीम था। मुझे विधाता ने सृष्टि का एक सबसे सुन्दर पुष्प दिया था और मैँने बरसाने की दूसरी कमलिनी पाने की आशा कर रखी थी।'
🔅मईया का उन्माद जाग जाता है और बार-बार कहती है-मैँ अभागिनी हूँ। मेरी गोद मेँ कोई सुरक्षित नहीँ रह सकता। मैँ अपनी अमंगल छाया बरसाने मेँ कीर्तिदा की लाडली पर डालने का साहस नहीँ कर सकती।'
▪मईया अनेक बार नन्दग्राम की बालिकाओँ से अनुरोध करती हैँ-तुम सब बरसाने जाकर लाडली जू को मिल आओ। उसका समाचार पाकर ही मैँ सन्तोष कर लूँगी।
🔅वह मेरी कल्याणी---!' मईया कभी इतना कहने लगती है तो मूर्छा उसे कभी वाक्य पूरा नहीँ करने देती।
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]
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