🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-37] ▪
📬 कल हमने पढ़ा कि "कन्हैया जब ब्रज में था तो आंधी आने पर मईया,गोप सब संशक हो उठते है। गोप बालक ऐसे समय में कन्हैया को वृक्ष के नीचे नहीं जाने देते थे, क्योंकि आंधी में फल ही गिरेंगे, कोई शाखा टूटकर नही गिरेगी यां वृक्ष नही गिरेगा इसका तो कोई आश्वासन नहीं है। अब आगे.........
🔅 'एक गोपी ने एक दिन कह दिया की उस राक्षस को तो आपके कन्हैया ने शैशव मेँ ही मार दिया था।'
▪मईया को तो लगता है जैसे तृणावत आज अभी ही कन्हैया को आकाश मेँ उड़ा कर ले गया हो।
🔅मईया कन्द्रन करती हुई कहती है-'धिक्कार है मुझे! मैँ उसकी माँ कहलाने के योग्य भी नहीँ हूँ। सब मुझ पर थूको कि मैँ अपने पुत्र का भार नहीँ सह सकती और यह अधमा अब भी आशा करती है कि कन्हैया इसे माँ समझता रहे लेकिन कन्हैया है ही इतना भोला कि उसके ध्यान मेँ इसकी छुद्रता नही आयेगी।'
▪बहुत कठनाई से उस दिन मईया को सम्हाला गया तबसे मईया को तृणावत-वध का स्मरण कोई नहीँ दिलाता।
🔅ब्रजराज ने महर को समझाते हुए कहा कि 'मथुरा महानगर है। वहाँ ऊँचे-ऊँचे भवन है। वहाँ आँधी का वेग इतना कठिन नहीँ रहता और सब लोग अपने गृह-द्वार बंद करके बैठ जाते है।'
▪मईया जब चाहे बोलने लगती है ।'कन्हैया भी द्वार बंद करके बैठ जाता होगा।' तब तो उसे कोई कार्य न होने पर उसे स्मरण आता होगा कि उसकी गायेँ आँधी मेँ वन मेँ भागती-दौड़ती होगी। उसे ब्रज का,सखाओँ का और अपनी इस अभागिनी मईया का स्मरण आता हो?'
🔅कन्हैया को जब स्मरण आयेगा और उसके कमलदल विशाल लोचन अश्रु-विमोचन करेँगे,यह कल्पना बहुत दु:खद,अत्यन्त असह्य है;किन्तु इसका कोई उपाय भी तो नहीँ हैँ।
▪मईया यह सोचकर 'हाय-हाय' करके छटपटाने लगती है,कभी मूर्छित हो जाती है,कभी प्रलाप करती हुई कहने लगती है-'पवनदेव! तुम सबके प्राण हो। तुम चाहो तो मेरे प्राण ले लो;किन्तु मेरे कन्हैया के लिए सदा सुखद बने रहना!'
🔅मईया मनौती करती है और वासुदेव की प्रसन्नता के लिए धूप जलाती है। कन्हैया जब बन्दरो को माक्खन खिलाता था तो मैँ कर्मजली छड़ी लेकर दौड़ती थी उसपर।'
▪मईया कहती है-'पवनदेव! तुम्हारे पुत्र हैँ, हनुमान,मैँ उनके बानरो को प्रतिदिन खिलाऊँगी। आपसे प्रार्थना है आप मेरे लाल के लिए कभी प्रतिकूल मत बनना।
🔅मईया जब चाहे उल्लसित होकर द्वार की और भागती है। मईया को तो वायु मेँ आयी प्रत्येक गन्ध अपने कन्हैया की अंग-गन्ध ही लगती है। अत:वायु मईया को अधिक प्रिय है;लेकिन वायु का वेग बढ़ते ही उसकी व्याकुलता,आशंका भी बढ़ जाया करती है।
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]
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