Saturday, 14 November 2015

unmadini yashoda 51

🔆       [जय गौर हरि]           🔆

▪      [उन्मादिनी यशोदा-51]    ▪

🔅वर्षगाँठ प्रतिवर्ष ही आती है और सभी बालको की आती है। सबकी वर्षगाँठ मईया को ही स्मरण है। प्रात: बड़े उत्साह से उठती है-'आज कन्हैया की वर्षगाँठ है।'

▪बहुत शीघ्र ही यह उत्साह समाप्त हो जाता है;क्योकि मईया श्री ब्रजेश्वर के समीप ही तो बड़े अन्धेरे मे सन्देश भेजेँगी। आज कन्हैया को वन मेँ मत जाने देना। महर्षि शाण्डिल्य को बुलवा लो।

🔅ब्रजेश्वर कहते है-'महर! उसकी वर्षगाँठ मनाने का सौभाग्य दैव देगा,तब ही हम मनायेँगे।' यह सौभाग्य अभी तो भाई वासुदेव जी को प्राप्त है।

▪'बाबा जानते है कि आज बड़ा धक्का लगेगा ब्रजेश्वरी को;किन्तु उपाय क्या है? वे स्वयं इसीलिए भवन मेँ आ जाते है कि उनकी उपस्थिति से आघात कुछ तो सम्हल सकेगा।

🔅मईया एकटक मुख देखती कहती है-'महर! तुम आज भी मथुरा नहीँ जाओगे?' उसे वर्षगाँठ पर तो मेरे उपहार दे आओ!'

▪बाबा अत्यन्त व्यथित स्वर मेँ कहते है-महर! मैँ जा सकता तो प्रतिदिन उसे देखने जाता 'अभी जरासन्ध को लौटे कितने दिन हुए है? मथुरा अगम्य हो गयी है और वह बहुत व्यस्त होगा। मेरे जाने से कन्हैया को बहुत संकोच भी होगा। उसने कहा है कि वह स्वयं आयेगा।'

🔅'अच्छा महर! कहकर मईया कटे वृक्ष के समान हताश होकर गिर पड़ती है और दीर्घश्वास लेती है-'कन्हैया आज नही आयेगा। आज देवकी उसे कैसे आने दे सकती है।' कितने उत्साह से मैने उसके लिए उपहार सजाये थे।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]

🔆▪🔆▪🔅▪🔆▪🔆

No comments:

Post a Comment