Saturday, 14 November 2015

unmadini yashoda 57

🔆      [जय गौर हरि]            🔆

▪      [उन्मादिनी यशोदा-57]      ▪

🔅'बलिहारी बलिहार।
      प्रहलाद-पालन हार॥'

गोपों ने अब अपनी यह कीर्तन-ध्वनि कुछ बड़ी बना ली है-- 

🔅'नरहरि नन्दलाल!'
जय-जय गिरिधारी गोपाल।'

▪गोपी या गोपों में बहुत से खीझते हैं और कहते हैं-'अरे! तुम सब इतनी धूम क्यों मचाते हो?' जिनका अन्तर वियोग-दग्ध हो रहा है उन्हें कोलाहल तथा बालकों की उछल-कूद कहाँ सुहाती है।

🔅सब गोप-बालक भी विचित्र हैं। कभी तो इतने हताश,सुस्त हो जाते हैं जैसे इनमें जीवन ही न रह गया हो और कभी पूरा आकाश मानो सिर पर उठा लेँगे। इनके कोलाहल की,धूम की कोई सीमा नहीं रहती और ऐसे समय यह किसी की नहीं सुनते।

▪बालकों को समय का ध्यान कहाँ रहता है। सब बालक कहते है -'प्रह्लाद को जलाने वाली राक्षसी होलिका बार-बार जी जाती है। अभी पिछले वर्ष ही तो हमने उसे जलाया था।'यदि वह इस वर्ष यदि फिर जी गयी तो हम अब की दारी को दुगुनी लकड़ियों में फूंकेंगे।'

🔅मईया द्वार पर दौड़कर आती है और बालकों से पूछती है-कन्हैया कहाँ है ? बालक इतने उत्साह में हैं, ऐसे गाते-बजाते कूद रहे हैं तो कन्हैया को इनके साथ ही होना चाहिए। वह साथ न हो तो गोप-बालकों में उत्साह आ नहीं सकता।'

▪बालक मईया की बात सुने बिना अपनी ही कहते हैं--'मईया! तू उसे जगा मत। वह गोचारण से थका लौटा है।' बहुत सारी लकड़ियाँ हमने एकत्र की हैँ। राक्षसी होलिका को हम सब जला देंगे।'

🔅'लेकिन कन्हैया है कहाँ? मईया की पुकार सुनने को बालक अपनी धुन में गाते,कूदते दूर चले जाते हैं ?

▪मईया द्वार पर ठगी सी खड़ी उन सबकी ओर एकटक देखती रहती है।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]

🔆▪🔆▪🔅▪🔆▪🔆

No comments:

Post a Comment