Saturday, 14 November 2015

unmadini yashoda 77

🔆            [जय गौर हरि]            🔆
▪        [उन्मादिनी यशोदा-77]    ▪

🔅 विचित्र-विचित्र सम्वाद आते थे मथुरा के सम्बध्ध मेँ। मईया को कम से कम यह बहुत विचित्र लगते थे। सामान्य सम्वाद केवल एक आया था--'दाऊ-कन्हैया गुरुकुल मेँ अध्ययन करने गये।'

▪मईया को सन्तोष हुआ था।' कन्हैया पढ़ेगा तो सही।' वह गोपियों से कहती थी--'अवन्तिकापुरी दूर है तो क्या हुआ। वहाँ की राजमाता है दाऊ की बुआ राजाधिदेवी जी। कन्हैया अग्रज के साथ पढ़ेगा तो कुछ पढ़ लेगा। अकेला तो वह पढ़ नहीँ सकता था।

🔅 'दाऊ-कन्हैया पढ़कर गुरुकुल से लौट आये।' तीन महीने भी पूरे नहीँ हुए और यह समाचार आ गया। मईया को बहुत विचित्र लगा। इसने तो सुना है कि गुरुकुल मेँ बालक को वर्ष लगा करते हैँ।

▪कन्हैया बहुत चपल है। वह भला कैसे चुपचाप बैठकर पढ़ता? मन नहीँ लगा तो बड़े भाई के साथ भाग आया।' मईया को नहीँ लगता कि इतने अल्प समय मेँ कुछ पढ़ भी सकता है; किन्तु इससे कोई क्षोभ इसे नहीँ है--'ब्रजेश्वर के कुमार को पढ़कर करना भी क्या है? उसके सब भाई और सखा तो बिना पढ़े ही हैं।'

🔅मईया को उल्टे सन्तोष हुआ-'अब वह यहाँ लौट आयेगा। मथुरा के पढ़े लिखे लोगों मेँ वह स्वयं ऊब जायगा। पढ़ने के लोभ से ही वहाँ अब तक टिका था।'

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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