🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-55] ▪
🔅प्रतिवर्ष सब गोप शिवरात्रि पर अम्बिका वन की यात्रा करते हैँ। मईया इस यात्रा के आरम्भ में आर्त होकर 'महर से कहती है कि यदि फिर कोई अजगर कहीँ से आ गया तो?'
▪इस यात्रा में बाबा को अजगर निगलने लगा था और लगभग कटि तक निगल चुका था। गोपों के किसी भी उल्मुक-प्रहार का अजगर पर कोई प्रभाव नही पड़ा था। जब कन्हैया ने आकर एक लात लगायी,तब वह अजगर से गन्धर्व बनकर आकाश में उड़ गया था।
🔅मईया को ऐसा लगता है जैसे आज की ही घटना हो। 'अजगर बहुत हठी होते हैं। वे उल्मुकों से पीटे जाने पर भी नहीं मानते'। मईया का मन धुकधुक कर रहा है-'अब कन्हैया कहाँ है जो अजगर को लात मारकर गन्धर्व बना देगा!'
▪बाबा भरे नेत्रों से कहते हैं--'महर! कन्हैया था तभी अजगर भी आया था।' उससे वियुक्त नन्द को निगलने आये,ऐसा कोई अजगर भी कहीँ नहीँ है।'
▪मईया मनौती करने जैसे स्वर में कहती है-'काश अब अजगर कहीँ होता और अब इस बार मुझे आकर निगल लेता!' लेकिन जानती हूँ,कोई नहीं आयेगा। मुझे निगल कर कौन सा उसका उद्धार होना है। मुझ पुत्रहीना को निगलकर तो उसके भी उदर में ज्वाल ही जागेगी।'
🔅'कन्हैया कितने उत्साह से शिवरात्रि का व्रत करता था।' मईया के लिए तो निर्जल व्रत अब स्वभाविक हो गया है। ब्रज में सब इस पर्व पर निर्जल करते हैँ और सब अम्बिकावन जाते है;किन्तु अब गोपकुमारों में पाँच या एकादश दल के बिल्वपत्र दूँढ़ने का उत्साह नहीं है।
▪सरस्वती स्नान,रात्रि-जागरण,चारों पहर की सविधि पूजा सब बड़ी श्रद्धा से,पूरी सावधानी से करते हैं। भगवान शिव के लिंग विग्रह की तथा देवी अम्बिका की पूजा में कोई शिथिलता नहीं। बल्कि श्रद्धा,एकाग्रता बढ़ी ही है।
🔅महर्षि शाण्डिल्य मुनिगणों के साथ आते हैं तब रुद्रार्चन होता है प्रभात से दूसरे प्रभात तक। अब एक ही अन्तर आया है,अब गोप-बालक भी रात्रि के चतुर्थ प्रहर का पूजन होने पर अरुणोदर तक कीर्तन करते हैं।कोई भी पलकें नही झपकता। पलकें झपकती ही नहीं यह कहना अधिक उपयुक्त है।
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]
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