🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-64] ▪
🔅ब्रज मेँ पीतपट पहनने की बीमारी चल पड़ी है। बालकों ने दूसरे सब रंग त्याग दिये हैँ। बालिकाओं को भी अब पीली साड़ियाँ ही पहननी हैँ। बहुत कम गोप,गोपियाँ हैं , जो अपने पहले वाले प्रिय रंग को पहनते हैँ। ब्रजराज अवश्य कासाय वस्त्र धारण करते हैं ;किन्तु उनसे भी बड़े अब पीली कछनी बाँधने लगे हैं।
▪मईया किसी को भी आती देखती है तो उन्हे पहले यही भ्रम होता है--'कन्हैया आया!' वह स्त्री-पुरुष, बालक-वृद्ध भी नहीँ देखती। देखती है तो केवल वस्त्र का रंग।।
🔅मईया जब कोई वृद्ध गोप के वस्त्र पर दृष्टि पड़ते ही दौड़ना चाहती तो सेविकाएँ अनेक बार कहती हैं कि - 'आपका कन्हैया ऐसी श्वेत दाढ़ी वाला कैसे हो गया ?'
▪मईया किसी भी बालक को अंक मेँ लेकर बार बार उसका मुख देखती है-'तू रुग्ण है?' तेरा मुख पीला-पीला क्योँ लगता है?'
🔅'यह तो वस्त्र के कारण ऐसा लगता है।'बालकों को,बालिकाओं को भी यह बहाना मिल गया है; किन्तु उसे छिपाने का उपाय यह पीत वस्त्र बन गया है।
▪'तू अब पीताम्बरा हो गयी?' मईया किसी बालिका से कह देती है तो बालिका का मुख लज्जा से सिन्दूरारुण हो उठता है। उसे सूझता ही नहीँ कि वह क्या बहाना करे।
🔅केवल वृद्धाएँ यह बात मुख से कहती हैँ--'आपका कन्हैया ऐसे ही वस्त्र पहनता था।' अब वह कभी दौड़ता आकर अंक मेँ तो नही बैठता। उसके वस्त्र का रंग देह से लिपटा रहता है तो उसके उस अमृतस्पर्श का तनिक भ्रम बना रहता है।'
▪'उसके स्पर्श का भ्रम!' मईया कन्हैया के वस्त्र करों मेँ लेती है,स्पर्श करती है और अत्यन्त कातर हो उठती है।
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪
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