🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-67] ▪
🔅बाबा व्यथा-भरे स्वर मेँ कहते हैँ --'महर! तुम यह क्या करने बैठी हो? मेरा या तुम्हारा शरीर अब अपना रहा है?'
▪तुम्हारा कन्हैया आयेगा और अपनी मईया के करों मेँ व्रण देखेगा,उसके कमल-नेत्रों की धारा रुकेगी ? तुम उसको उठाकर अंक मेँ कैसे लोगी? तुम अपने कर से उसके मुख मेँ नवनीत नहीँ दोगी तो वह भूखा नहीँ रहेगा?'
🔅मईया पदों पर सिर रखकर फूट फूटकर रोती-'मेरे स्वामी! मेरे देवता! इसे रो लेने दिया जाए ,इसके अतिरिक्त इसके उग्र आवेश की शान्ति का कोई अन्य उपाय नहीँ है।
▪मईया चाहे जिस गोपी के पैर पकड़ लेती है--'मेरे कन्हैया ने तुम्हारे बहुत भाण्ड फोड़े, बहुत दधि खाया लुटाया। तुम दया करके दधि-सहित भाण्ड ले जाओ। कन्हैया को ऋण-मुक्त कर दो। मना मत करो मुझ पर कृपा करके ले जाओ।'
🔅गोपी मुर्छित होकर गिर पड़े इसमें कोई आश्चर्य नहीँ। लगता है कि ह्रदय टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा। वह चीत्कार करेगी--'ब्रजेश्वरी! आप इतनी निष्ठुर मत बनो। मेरा वध कर दो; किन्तु यह मत कहो। मत सुनाओ यह सब। हाय कितनी मूर्खा हूँ मैँ।'
▪इतनी कातर चित्कार कि मईया चौँक पड़ती है।
🔅जेठानियाँ, देवरानियाँ दूसरी भी अनेक हैँ जो क्रोध और रुदन के साथ बोलती हैं --'कन्हैया हमारा नहीँ है?' हमने कभी तुम्हें उलाहना दिया था? उसे कभी कुछ कहा भी तो अपने को ही तो कहा। तुम कहती हो कि कन्हैया हमारे डांटने से ,हमारे उलाहनों से ब्रज छोड़कर गया?'
▪मईया बहुत शीघ्र पैर पकड़कर क्षमा मांगने लगती। किसी के लिए इससे निष्ठुर बात क्या होगी कि कन्हैया के दधि लुटाने की चर्चा उससे की जाए।
मईया इसे समझती है किन्तु उन्माद मेँ यह भूल भी तो जाती है।
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪
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