🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-25] ▪
📬 कल हमने पढ़ा कि "मईया ब्रजेश्वर जी से कहती है 'कोई नही देखता मुझ दुखिया की ओर। मुझसे मेरा अंग धन खो गया है। कोई मुझ पर दया नही करता। मैंने किसी का कुछ नही बिगाड़ा। ' वियोग का समय होने पर मईया क्या बोल जायेगी,इसका कुछ ठिकाना नही। अब आगे......
🔅गोपियों की तो व्यथा का अन्त ही नही है।सब गोपियो का मानना है कि कन्हैया हम सब की उलाहनोँ से ऊब कर चला गया है।हमसे कन्हैया का भुवनसुन्दर मुख देखे बिना रहा नहीँ जाता था और हम कोई-न-कोई बहाना बनाकर ब्रजेश्वरी के समीप पहुँच जाती थी- कभी कुछ और कभी कुछ नित्य नये लाञ्छन लगाती थी।
▪अब यदि कन्हैया को हमारे उलाहनोँ का स्मरण होगा तो कितनी वितृष्णा जागेगी उसके मन मेँ?
🔅 गोपियाँ कहती है हम सबने कन्हैया को तंग भी तो कम नहीँ किया।थोड़े से माखन के लिए नचाया,गोबर उठवाया और क्या-क्या नही किया!
▪गोपियो को अब बहुत कुछ स्मरण आता है-'कितना भोला,कितना स्नेहमय था हमारा कन्हैया; किन्तु मथुरा जाकर तो कन्हैया को हमारा गँवारपना स्मरण आता होगा।'
🔅 हम सब कहेँ भी तो किससे कि हमने सब प्रेम-विवश होकर और कन्हैया के स्नेह मेँ आकर किया?' कोई उपाय भी तो नहीँ दीखता है।
▪मईया पहले भी कहती थी-कन्हैया तो तुम सबके आर्शीवाद से ही ब्रज मेँ आया। तुम सबके पुण्यो के प्रताप से ही कन्हैया इतने इतने संकटो मेँ सुरक्षित रहा।'
🔅गोपियाँ को इतना कहना भी कठिन होता है-'ब्रजेश्वरी! हमेँ क्षमा करना।'
▪ मईया अपना आँचल हाथ मेँ लेकर पैरो पर सिर रख देती हैँ-तुम सब आर्शीवाद दो। कन्हैया जहाँ रहे,सुखी रहे,प्रसन्न रहे। इस दुखिया मईया की कोई बात सोचकर कभी दुखी न हो।
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]
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