🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-74] ▪
🔅विकट समस्या है ऊखल। सेविकाएँ इतने बड़े ऊखल को कहाँ छिपा दें ? श्री ब्रजराज के घर का काम इसके बिना नहीँ चलता। चल भी सकता होता तो भी इससे छुटकारा नहीँ होना था। श्री ब्रजेश्वरी कभी इसे फेँक देना चाहती है और कभी इसे भुजाओं मेँ भरकर बैठती है। गोपियों मेँ भी कुछ है और बालिकाएँ तो बहुत है जो दूसरों की दृष्टि बचाकर इसे सिर से स्पर्श करती है। इस ऊखल के भाग्य को कहा क्या जाय। ब्रज मेँ इसकी पूजा होने लगी है।
▪मईया अनेक बार ऊखल को उठाना चाहती है। 'यह इतना भारी है।' भला ऊखल कहीं एक किसी गोपी से उठता है ? हिलाती-डुलाती है और फिर रुदन करती है--'मैँने इतने भारी ऊखल से सुकुमार नन्हे कन्हैया को बाँध दिया था। वह इसे घसीटता रहा।'
🔅मईया ऊखल के समीप पहुँचे तो गोपियों को बहुत सावधान रहना पड़ता है। मईया किसी भी क्षण ऊखल पर सिर पटक दे सकती है। ऊखल को भुजाओं मेँ भरकर बैठी रहे, उस पर सिर ढाले रहे, तभी तक कुशल है।
▪'मईया कहती है---'मुझ बन्ध्या को दूसरे का पुत्र पाकर बड़ा अभिमान हो गया था। मैँ उस पर अपना अधिकार प्रकट करने वाली बन गयी थी।' मईया जब ऐसी बातें करने लगती है, कोई न कोई सेविका ही उसके मुख पर हाथ धर देती है।'
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪
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