Monday, 9 November 2015

unmadini yashoda 45

🔆    [जय गौर हरि]          🔆

▪      [उन्मादिनी यशोदा-45]    ▪

📬 कल हमने पढ़ा कि " मईया कभी स्वयं गोबर छूकर, हाथ मेँ उठाकर देखती है और अब दूसरी ही धुन चढ़ती है-'गोष्ठ स्वच्छ कर दो झटपट गोबर उठा दो। वह आयेगा तो यहीँ गोबर मेँ बैठा रहेगा। अब आगे......

🔅मईया अनेक बार गोपियो को यमुना तट भेजती है और कभी स्वयं उठकर दौड़ जाती है;'कन्हैया यमुना तट चला गया।' उसे स्नान का व्यसन है और उस नटखट को पानी मेँ उतरते देर भी नहीँ लगती।'

▪मईया पुलिन पर इधर से उधर भटकती ढ़ूँढ़ती हुई पूछती है-'यहाँ कन्हैया आया था?'

🔅मईया तो ऐसे ढ़ूँढ़ती है,जैसे कोई खोई सूई ढ़ूँढ़ रही हो।

▪वहाँ कोई न कोई गोपिका या गोपकुमार अवश्य मिल जायेगी। जल भरने के लिए आयी अपने कलश को एक ओर रखकर वह अपलक यमुना के प्रवाह को घूरती बैठी रहती है।

🔅 गोपियाँ भी क्या उत्तर दे मईया को?

▪इन सबको भी घर जैसे कटखाने को दौड़ता है। यमुना तट आती है तो लगता है कि किसी कुञ्ज से वह नवघनसुन्दर अभी सखाओँ के साथ हँसता निकल पड़ेगा और उनके कलश पर या तो कंकड़ी मारेगा या लकुट से उसे पानी मेँ ठेलकर ताली बजाता कूदेगा।

🔅मईया पूछती है तो लगता है कि कलश उठाकर पटक दे और अपना फूटा कपाल किसी पत्थर पर पटक दे। इन अभागे कलशो के पीछे हमने इन्हीँ ब्रजेश्वरी से कितनी बार उलाहना दी है। कितनी भार यह अपने कन्हैया पर खीझी हैँ।

▪सबको लगता है कि यमुना भी उनके वियोग मेँ रुदन कर रही है। उसमेँ अब जल नहीँ;अश्रुधारा बहती है। कालिन्दी की लहरेँ भी पुलिन पर सिर पटक रही हैँ।

🔅मईया से क्या उत्तर दे? यमुना-पुलिन स्वच्छ पड़ा है। अब कहाँ पुलिन पर वे बज्र,अंकुश,ध्वज,कमल आदि से युक्त पद-चिन्ह बालको के पद-चिन्होँ मेँ दीख पड़ते हैँ।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]

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